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रविवार, 3 मई 2015

muktika: sanjiv

मुक्तिका:
संजीव 
हमको बहुत है फख्र कि मजदूर हैं
क्या हुआ जो हम तनिक मजबूर हैं. 
कह रहे हमसे फफोले हाथ के 
कोशिशों की माँग का सिन्दूर हैं 
आबलों को शूल से शिकवा नहीं 
हौसले अपने बहुत मगरूर हैं. 
*
कलश महलों के न हमको चाहिए 
जमीनी सच्चाई से भरपूर हैं. 
स्वेद गंगा में नहाते रोज ही 
देव सुरसरि-'सलिल' नामंज़ूर है. 

***

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