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बुधवार, 27 मई 2015

navgeet: sanjiv

नवगीत:
संजीव 
*
चलो मिल सूरज उगायें 
*
सघनतम तिमिर हो जब 
उज्ज्वलतम कल हो तब 
जब निराश अंतर्मन-
नव आशा फल हो तब 
विघ्न-बाधा मिल भगायें 
चलो मिल सूरज उगायें 
*
पत्थर का वक्ष फोड़ 
भूतल को दें झिंझोड़ 
अमिय धार प्रवहित हो 
कालकूट जाल तोड़ 
मरकर भी जी जाएँ 
चलो मिल सूरज उगायें 
*
अपनापन अपनों का 
धंधा हो सपनों का 
बंधन मत तोड़ 'सलिल' 
अपने ही नपनों का 
भूसुर-भुसुत बनायें 
चलो मिल सूरज उगायें 
*



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