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मंगलवार, 16 जून 2015

doha

दोहा सलिला:
संजीव
*
जिसे मुहब्बत हो वही, है अ-शोक लें मान
श्री वास्तव में दे उसे, खुद बढ़कर भगवान
*
कंकर में शंकर बसे, देख सके तो देख 
दृष्टिहीन दीपक लिए, कहे तिमिर की रेख
*
कब कैसे किससे कहे, बेला मन की दर्द
सुनें हँसेंगे लोग सब, आह भरेंगे सर्द
*

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