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बुधवार, 17 जून 2015

muktika:

मुक्तिका:
मापनी -२१२/२१२/२१२/
संजीव
*
वक्त ने आपसे क्या कहा? 
वक्त से आपने क्या गहा??
आस से श्वास गंधित रही
प्यास पी तृप्त-चुप क्या रहा?
पत्थरों से किनारे रहे
प्यार की धार में क्या बहा?
लूट ले दिल मेरा गम नहीं
तू बसा है यहीं आ अहा.
किस्मतों पे भरोसा किया
निस्बतों ने न क्या-क्या सहा?
वायदों का बगीचा जहां
कायदों का वहीं घर ढहा
दर्द को मर्द ने ही तहा
सर्द हो कर 'सलिल' क्यों दहा?
*

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