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शुक्रवार, 19 जून 2015

navgeet: sanjiv

नवगीत:
संजीव 
*
पगड़ी हो 
या हो दिल 
न किसी का उछालिये 
*
हँसकर गले लगाइये 
या हाथ मिलायें 
तीरे-नज़र से दिल, 
छुरे से पीठ बचायें 
हैं आम तो न ख़ास से 
तकरार कीजिए- 
जो कीजिए तो झूठ 
न इल्जाम लगायें 
इल्हाम हो न हो 
नहीं किरदार गिरायें  
कैसे भी हो 
हालात  
न जेबें खँगालिये   
पगड़ी हो 
या हो दिल 
न किसी का उछालिये 
*
दिल से भले भुलाइये  
नीचे न गिरायें  
यादें न सही जाएँ तो 
चुपके से सिरायें 
माने न मन तो फिर 
मना इसरार कीजिए- 
इकरार कीजिए 
अगर तो शीश चढ़ायें 
जो पाठ खुद पढ़ा नहीं 
न आप पढ़ायें   
बच्चे बिगड़ न जाएँ 
हो सच्चे   
सम्हालिए 
पगड़ी हो 
या हो दिल 
न किसी का उछालिये 
*

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