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बुधवार, 24 जून 2015

shubhkamna geet: sanjiv

शुभ कामना गीत:
अनुश्री-सुमित परिणय १२-६-२०१५ बिलासपुर 
संजीव 
*
मन जो मन से मिल गया 
तो मन ने हँस कहा: 
'मन तू मन से मिल गया 
है' मन ने फँस कहा
'हाथ थाम ले जरा
तू संग-संग चल,
मान भी ले बात  मेरी
तू न यूँ मचल.
बेरहम न बन कठोर-
दिल जरा पिघल,
आ गया बिहार से 
बिलासपुर सम्हल'
मन जो मन से मिल गया 
तो मन ने धँस कहा.
*
मन जो मन से मिल गया 
तो मन ने रुक कहा:
'क्या करूँ मैं साथ तेरे 
चार-कदम चल? 
कौन जनता न कहीं 
जाए तू बदल?
देख किसी और को 
न जाए झट फिसल? 
कैसे मान लूँ कि तेरी 
प्रीत है असल?
मन जो मन से मिल गया 
तो मन ने तन कहा.
*
मन जो मन से मिल गया 
तो मन ने मुड़ कहा:
'मैं न राम सिया को जो  
भेज दे जंगल
मैं न कृष्ण प्रेमिका को 
जो दे खुद बदल.
लालू-राबड़ी सी करें    
प्रीत हम अटल. 
मोटियार मैं तू
मोटियारी है नवल.'
मन जो मन से मिल गया 
तो मन ने तक कहा.
*
मन जो मन से मिल गया 
तो मन ने झुक कहा:  
चक्रवात जैसी अपनी 
प्रीत हो प्रबल।
लाख हों भूकम्प नहीं 
प्यार हो निबल 
सात जनम संग रहें
हो न हम निबल 
श्वास-श्वास प्रीत व्याप्त 
ज्यों भ्रमर-कमल 
मन जो मन से मिल गया 
तो मन ने मिल कहा.
*
मन जो मन से मिल गया 
तो मन ने फिर कहा:
नीर-क्षीर मिल गया 
न कोई दे दखल
अंतरों से अंतरों को 
पल में दें मसल
चित्र गुप्त ज़िंदगी के 
देख-जान लें 
रीत प्रीत की निभा 
सकें, सजल नयन 
मन जो मन से मिल गया 
तो मन ने हँस कहा.
*  
संगीत संध्या 
११.६.२०१५
होटल ईस्ट पार्क बिलासपुर

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