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मंगलवार, 9 जून 2015

virasat: aansu -prasad

विरासत 
आँसू  
जयशंकर
​ प्रसाद
छिल-छिल कर छाले फोड़े 
मल-मल कर मृदुल चरण से 
धुल-धुल कर बह रह जाते 
आँसू करुणा के कण से

​*
इस हृदय कमल का घिरना
 
अलि अलकों की उलझन में 
आँसू मरन्द का गिरना 
मिलना निश्वास पवन में
*​
चातक की चकित पुकारें 
श्यामा ध्वनि सरल रसीली 
मेरी करुणार्द्र कथा की 
टुकड़ी आँसू से गीली

जो घनीभूत पीड़ा थी 
मस्तक में स्मृति-सी छायी 
दुर्दिन में आँसू बनकर 
वह आज बरसने आयी
*
 
मेरे क्रन्दन में बजती 
क्या वीणा, जो सुनते हो 
धागों से इन आँसू के 
निज करुणापट बुनते हो
*

श्यामल अंचल धरणी का 
भर मुक्ता आँसू कन से 
छूँछा बादल बन आया 
मैं प्रेम प्रभात गगन से
*

शीतल समीर आता हैं 
कर पावन परस तुम्हारा 
मैं सिहर उठा करता हूँ 
बरसा कर आँसू धारा
*
अब छुटता नहीं छुड़ाये 
रंग गया हृदय हैं ऐसा 
आँसू से धुला निखरता 
यह रंग अनोखा कैसा
*
नीचे विपुला धरणी हैं 
दुख भार वहन-सी करती 
अपने खारे आँसू से 
करुणा सागर को भरती
*
उच्छ्वास और आँसू में 
विश्राम थका सोता है 
रोई आँखों में निद्रा 
बनकर सपना होता है
*
अपने आँसू की अंजलि 
आँखो से भर क्यों पीता 
नक्षत्र पतन के क्षण में 
उज्जवल होकर है जीता
*
 

वह हँसी और यह आँसू 
घुलने दे-मिल जाने दे 
बरसात नई होने दे 
कलियों को खिल जाने दे
*

फिर उन निराश नयनों की 
जिनके आँसू सूखे हैं 
उस प्रलय दशा को देखा 
जो चिर वंचित भूखे हैं
​*
संदेश में फोटो देखें
​आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
, 94251 83244
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.in
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil' 

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