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सोमवार, 6 जुलाई 2015

muktak:

मुक्तक:
*
त्रासदी ही त्रासदी है इस सदी में

लुप्त नेकी हो रही है क्यों बदी में

नहीं पानी रहा बाकी आँख तक में

रेत-कंकर रह गए बाकी नदी में

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पुस्तकें हैं मीत मेरी

हार मेरी जीत मेरी

इन्हीं में सुख दुःख बसे हैं

है इन्हीं में प्रीत मेरी

*

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