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गुरुवार, 6 अगस्त 2015

शोध लेख:

शोधपरक लेख :

मालवांचल के काया गीतों में व्याप्त जीवन दर्शन

स्वर्णलता ठन्ना


चित्रांकन
संदीप कुमार मेघवाल
लोक जीवन से जुड़ाव का मुख्य स्त्रोत गीत ही है। यदि लोकजीवन का स्पन्दन लयात्मकता के साथ हो, लोगों के दुख-दर्द की सही अभिव्यक्ति गीतों में हो तो ये गीत जनमानस की भावनाओं के संवाहक होने के साथ सही अर्थों में जनगीत बन जायेंगे। गीतों की सबसे लोकप्रिय शैली लोकगीत है। ‘लोकगीत’  का अर्थ है लोक परिवेश से जन्मा एवं वहीं की गायन शैली मे गाया जाने वाला गीत। यानी एक ऐसा गीत जो लोकरंग एवं लोकतत्वों को अपने में समाहित किए हो और लोककंठों द्वारा लोकधुनों में गाया जाय। वैसे गीत तो मानव जीवन का स्वर है मनुष्य की जययात्रा का वरदान है। पाश्चात्य दाशर्निक हीगेल ने गीत के सम्बन्ध मे लिखा है - ‘‘गीत सृष्टि की एक विशेष मनोवृत्ति होती है। इच्छा, विचार और भाव उसके आधार होते हैं।“  डॉ. राजेश सिंह ने अपनी पुस्तक ‘नवगीत का उद्भव एवं विकास’ में गीत एवं संगीत को परिभाषित करते हुए लिखा है -‘राग-रागिनियों से सज्जित गान को संगीत कहा गया है और छन्दबद्ध गेय रचनाओं को गीत।1

लोकगीतों के बारे में हम कह सकते हैं कि संपूर्ण संसार में मानव के अविर्भाव से लोकगीतों का उद्गम माना जाता है। यद्यपि लोकगीतों के जन्म की कोई निर्धारित काल रेखा नहीं है, परन्तु मौलिक परम्परा के अविच्छिन्न प्रवाह के रूप में ये निरन्तर असीम अतीत के गर्भ में छिपे उद्गम स्त्रोत की ओर इंगित करते हैं। लोकगीतों की अनंत प्रवाहमयी परम्परा की प्राचीनता के संबंध में पं. रामनरेश त्रिपाठी ने लिखा है- ”जब से पृथ्वी पर मनुष्य है, तब से गीत भी है। जब तक मनुष्य रहेंगे, तब तक गीत भी रहेंगे। मनुष्यों की तरह गीतों का भी जीवन-मरण साथ चलता रहता है। कितने ही गीत तो सदा के लिए मुक्त हो गए। कितने ही गीतों ने देशकाल के अनुसार भाषा का चोला बदल डाला, पर अपने असली स्वरूप को कायम रखा। बहुत से गीतों की आयु हजारों वर्ष की होगी। वे थोडे फेरबदल के साथ समाज में अपना अस्तित्व बनाये हुए है।2

        लोकगीत समय के साथ चलते हैं। समय और स्थान के अनुसार उनमें नाम और शब्द बदलते हैं, गीत वही रहता है, धुन वही रहती है। इस प्रकार परम्परागत अनजाने काल में निर्मित वे धुनें कण्ठ-कण्ठ से यात्रा करती हुई आज तक आ पहुँची हैं। उन गीतों में भजन है, प्रकृति के गीत है, जन्मपूर्व से मृत्यु तक के संस्कार गीत है। उन गीतों में स्थान, जाति एवं समुदाय के अनुसार स्वराघात या पारिवारिक विशेषता के कारण हल्के-फुल्के पाठांतर चाहे मिल जाए लेकिन मूल स्वर सबका एक ही रहता है। लोक साहित्य श्रुति साहित्य है। वैदिक साहित्य अपरिवर्तनशील पुरूष गीत है। लोकगीत परिवर्तनशील महिला गीत है। परन्तु अनुष्ठान के बिना दोनों पूर्ण नहीं होते। सब गीत विशेष अवसर, अनुष्ठान या कर्म से संबंधित है। ऐसे गीतों की अटूट परम्परा पूरे देश में है।3
   
        गीत महिलाओं की प्रेरणा शक्ति हैं, वे गीतों में हंसती हैं, गीतों में रोती हैं, गीतों में ढाढस पाती हैं, ढाढस देती हैं। वे गीतों के संसार में रमती रहती हैं। गीत की गति के साथ हंसिया भी चलता रहता है। पनघट से भरी गगरी गीतों से और रसीली हो जाती है। घट्टी की धुन में रूक-रूक कर एकाकी गीत नीरव को निरंतर रागिनी से भरता रहता है। गीत प्रीत के, गीत विरह के, गीत उलाहने के, गीत प्रतीक्षा के, गीत किस-किस के नहीं?4  लोकगीतों पर अपनी परिभाषा में डॉ. श्रीधर मिश्र कहते है - ‘अनुभूतियों के ज्वार में मानव का मन भंवर की भांति चक्कर काटता है, ऐसी स्थिति में हृदय के कोने से कोयल की भांति प्रेरणा उपजती है। शब्द मुखरित होते हैं, लय लिपट जाती है और गीत कंठ से निःसृत होने लगते हैं।’

        भारतीय जन अपने उल्लास, उमंग, शोक, विपदा, दर्द, खुशी सारे अनुभावों को लोकगीतों के माध्यम से जीवन में व्यक्त करते हैं। फिर चाहे वह हिन्दू मान्यताओं के अनुसार मनाए जाने वाले संस्कार ही क्यों न हो, सभी समारोह में लोकगीतों की गूंज सुनाई दे ही जाती है। हिन्दुओं में षोडश संस्कार माने जाते हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कार लगभग सभी जातियों में किसी न किसी रूप में मनाये जाते हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी संस्कारों में प्रायः गीत गाये जाते हैं। सभी संस्कारों के गीत उन परिस्थितियों को दर्शाते और संबल देते प्रतीत होते हैं। इन्हीं लोकगीतों की शृंखला में आते हैं, मृत्यु के समय गाये जाने वाले गीत। मृत्यु संस्कार मानव जीवन का अंतिम संस्कार है यद्यपि मृत्यु का अवसर शोक और रुदन का होता है किन्तु फिर भी कहीं-कहीं गीत गाने की प्रथा प्रचलित है। इस अवसर पर गाए जाने वाले गीत शोक, करुणा और विलाप से युक्त होते हैं।

       मृत्यु गीतों की प्राचीनता पर विचार करते हुए ऋगवेद के कुछ सूक्तों को प्रभाव रूप में उपस्थित किया जा सकता है। ऋगवेद में मृत व्यक्ति के प्रति शोक प्रकट  करने के अनेक सूक्त मिलते है। मृत व्यक्ति की आत्मा किस मार्ग से स्वर्ग जाएगी, उसकी रक्षा को कौन रक्षक रहेंगे आदि का वर्णन ऋगवेद की ऋचाओं में बड़े रोचक ढंग से किया गया है। मृतात्मा के लिए कहा गया है-          
प्रेहि-प्रेहि पथिमि पूव्येभिः,यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुः।
उमा राजाना स्वधया मदन्ता,यमं पशेयासि वरूणं देवम्।।-ऋगवेद 10।14।7

       रामायण और महाभारत में विशेष व्यक्तियों की मृत्यु पर विलाप के अनेक प्रसंग आये हैं ऐसे प्रसंगों को मृत्यु-गीतों की श्रेणी में रखा जा सकता है। कालिदास ने कुमारसंभव में रति का बड़ा मर्मस्पर्शी विलाप कराया है।5 रघुवंश में भी महाकवि ने इंदुमति की अकाल मृत्यु पर राजा अज का जो शोक व्यक्त किया गया है वह विश्व साहित्य में अद्वितीय है। श्रीमद्भागवत में कृष्ण द्वारा कंस के संहार हो जाने पर उसकी रानियां घोर विलाप करती है ।6 उर्दू साहित्य में मृत्यु के अवसर पर प्रचलित शोक गीतों को मर्सिया कहते हैं। ये ’मर्सिया’  करुणा और शोक से युक्त अत्यंत मार्मिक प्रभाव मन पर डालते हैं। अंग्रेजी में भी किसी व्यक्ति की मृत्यु पर कुछ पेशेवर स्त्रियां बुलाई जाती है। जो मृत व्यक्ति के गुणों का वर्णन करती हुई विलाप करती है। यह विलाप एक विशेष प्रकार की लय में बद्ध होता है।7  केवल साहित्य में ही नहीं, बल्कि साहित्य से इतर ग्रामीण क्षेत्र के लोकगीतों में भी मृत्यु के अवसर पर गाए जाने वाले गीतों की प्रथा अत्यंत प्राचीन है। इन गीतों के लिए कोई विशेष छन्द या राग का निर्धारण नहीं है। भारत के विभिन्न प्रांतों में इन गीतों के विविध रूप व्याप्त हैं। भोजपुरी, अवधी आदि क्षेत्रों में मृत्यु गीत गाने की किसी विशेष प्रथा का प्रचलन नहीं है। मृत्यु के पश्चात तेरहवें दिन मृत व्यक्ति का श्राध्द होता है, जिसे तेरहवीं कहा जाता है। इस अवसर पर ब्राह्मणों एवं कुटुम्बियों को भोज दिया जाता है। तेरहवीं के दिन स्त्रियां अनेक गीत गाती है जिनमें निर्वेद भाव की प्रधानता होती है। अवधी क्षेत्र में इस अवसर पर देवी के भजन गाये जाते है ।8

      मालवा प्रान्त में भी मृत्यु के अवसर पर गीत गाने की प्रथा का प्रचलन है। मृत्यु के अवसर पर गाये जाने वाले इन गीतों को ‘मसविणया’गीत कहा जाता है। निमाड़ में मृत्युगीतों को ‘मसाण्या’अथवा ‘कायाखो’ गीत कहते हैं किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर आत्मा की उभरता और शरीर की नश्वरता सम्बन्धी पारम्परिक गीत गाए जाते हैं। मसाण्या गीतों में आत्मा को दुलहन की उपमा दी गई है और शरीर को दुल्हा कहा गया है। मसाण्या गीत प्रायः मृत्यु के अवसर पर ही गाये जाते हैं, अन्य समय में गाना प्रतिबंधित होता है। मालवा व निमाड़ की संस्कृति में अनेक साम्य है। यही साम्य इन गीतों में भी मिलता है। अन्य प्रान्तों की तरह मालवा में भी मृत व्यक्ति के घर तेरह दिन का शोक रखा जाता है। इन तेरह दिनों तक स्त्रियां प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में मृत व्यक्ति की आत्मा की शांति के लिए एवं मृतक के परिजनों को संसार की नश्वरता बताते हुए भजन गाती हैं, जिनमें निर्वेद भाव की प्रधानता होती है। यह भजन मुख्यतः काया पर पर आधारित होते है, इसलिए मालवी में इन्हें ‘काया भजन’ भी कहा जाता है।

       इन काया भजनों में जीवन के प्रति अनासक्ति एवं मृत्यु के बाद की दुनिया के प्रति चिंता का भाव प्रकट होता दिखता है। जीवन में वह एक क्षण भी आ जाता है, जब शरीर की शक्ति चूक जाती है, सांसारिक आकर्षण सारे टूट जाते हैं और मनुष्य सारे आकर्षणों से विलग होकर दुनिया के बारे में सोचने लगता है। इन विरक्ति के भावों में गूंथें ये गीत मनुष्य को सोचने पर विवश कर देते हैं कि वे इस जगत से क्या लेकर जा रहें हैं, और उन्होंने इस दुनिया में रहकर क्या कमाया। धन, दौलत अथवा परोपकार या सत्कर्म। ये गीत महिला गीत है। प्रायः सभी संस्कार गीत महिलाओं द्वारा ही समूह में गाए जाते हैं। ये समवेत गीत बिना वाद्य के ही गाए जाते हैं।   मालवा की स्त्रियां जीव को अनेक नामों से उपमित करती हुई उसे दुनिया की नश्वरता के बारे में बताती हुई गाती है.

हंसा छोड़ों नगरी, जम से बिगड़ी
जम से बिगड़ी, हरि से सुधरी
हंसा छोड़ों नगरी, जम से बिगड़ी
घड़ी दोई घड़ी दोई ठहरो जमराजा
बेट्या फिरे बिलखी-बिलखी
हंसा छोड़ों नगरी, जम से बिगड़ी
जम से बिगड़ी, हरि से सुधरी
घड़ी दोई घड़ी दोई ठहरो जमराजा
बेटा बऊ फिरे बिलख्या-बिलख्या
हंसा छोड़ों नगरी, जम से बिगड़ी
जम से बिगड़ी, हरि से सुधरी

      गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि जो प्राणी जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है, इस संसार में कोई भी सदा के लिए नहीं रहता, इस सत्य को मालवा की स्त्रियां बड़े रोचक ढंग से उद्घाटित करती हुई अपने भजन में इसे शामिल कर लेती है, जिसमें स्वयं को केन्द्र में रखकर कहा गया है कि मुझे कौन सा इस दुनिया में रहना है, मुझे तो सब छोड़ कर एक दिन चले जाना है, अर्थात देह के भीतर आश्रय लेने वाला जीव सदा के लिए इस देह को धारण किये नहीं रहता, उसे तो एक-ना-एक दिन इसे छोड़ कर चलें जाना है। साथ ही मृत्युभोज की कुरीति पर व्यंग्य करते हुए महिलाएं गाती है -

म्हारे कई रेणो रे माया रा लोभी, एक दिन जाणो रे,
म्हारे काई रेणो रे
उन्ना भोजन कदी ए नी जीम्या, ठंडा से दिन काड्या रे
मरवा पाछे लाडू बंधाया, म्हारे काई जीमणो रे
एक दिन जाणो रे,
म्हारे कई रेणो रे माया रा लोभी, एक दिन जाणो रे,
म्हारे काई रेणो रे
ठंडी छाया कदी ए नी बैठ्या, तडका में दिन काड्या रे
मरवा पाछे तम्बू तणाया, म्हारे काई भैणो रे
एक दिन जाणो रे
म्हारे कई रेणो रे माया रा लोभी, एक दिन जाणो रे,
म्हारे काई रेणो रे
नया कपड़ा कदी ए नी पेर्या, फाट्या में दन काड्या रे
मरवा पाछे मिसरू पेराया, म्हारे काई पेरनो रे
एक दिन जाणो रे
म्हारे कई रेणो रे माया रा लोभी, एक दिन जाणो रे,
म्हारे काई रेणो रे...।

       मानव जीवन बड़ी मुश्किल से प्राप्त होता है। मानव को ईश्वर ने असीम क्षमताएं प्रदान की है कि वह अपनी भक्ति और समर्पण से मोक्ष का अधिकारी बन सकता है। अपने सांसारिक जीवन में जब उसका अंत समय निकट आता है तो वह मोक्ष की प्राप्ति के लिए भगवान से प्रार्थना करता है कि मेरे अंत समय में आप ही मुझे लेने आए। शुभ मुहुर्त हो, शुभ दिन हो और जीवात्मा को लेने स्वयं भगवान पधारें, तो मनुष्य को मोक्ष निश्चित ही प्राप्त हो जाएगा। ऐसे ही भाव इस भजन में आते हैं।

तू ही आजे रे गोपाल, लेवा म्हने तू ही आजे
जेठ मत आजे, आषाढ़ मत आजे,
सावण में आजे रे गोपाल
तू ही आजे रे गोपाल, लेवा म्हने तू ही आजे
नौमी मत आजे, दसमी मत आजे,
ग्यारस को आजे रे गोपाल
तू ही आजे रे गोपाल, लेवा म्हने तू ही आजे
दिन मत आजे, रात मत आजे,
भोर की वेरा, आजे रे गोपाल
तू ही आजे रे गोपाल, लेवा म्हने तू ही आजे

      जीवन में अनेक कठिनाइयों झेलते रहने वाला जीव जब अपनी अंतिम यात्रा पर निकलता है तो वह देखता है कि जीते-जी जो लोग उससे बोलते नहीं थे वे ही आज दुनिया को दिखाने के लिए रो रहे हैं। इस नश्वर शरीर के खत्म हो जाने पर दुखी हो रहे हैं, और मृत्युभोज का आयोजन कर रहे हैं। जिस मनुष्य को जीते-जी अच्छा भोजन भी प्राप्त न हुआ हो उसके मरने के बाद उसकी आत्मा की शांति के लिए भोज दिए जा रहे हैं। देखा जाए तो इस भजन के माध्यम से समाज की एक बड़ी कुरीति की ओर ध्यान आकृष्ट करने की चेष्टा की गई है, मृत्युभोज जैसी कुरीति पर व्यंग्य किया गया है -

सांवरिया म्हाने रंज आवे रे एक दिन रो
जीवता जीव प्रभु लाड्या बऊ नी बोल्या
झूठी काया पे माथा फोड्या रे
सांवरिया म्हाने रंज आवे रे एक दिन रो
जीवता जीव प्रभु ठंडा वासी जीम्या
झूठी काया रा लाडू बाट्या रे
सांवरिया म्हाने रंज आवे रे एक दिन रो
जीवता जीव प्रभु फाटा टूटा पेर्या
झूठी काया रा मिसरू रार्या रे
संवरिया म्हाने रंज आवे रे एक दिन रो

      काया में बसने वाले जीव को कहीं हंस तो कहीं भंवरे की उपमा देते हुए महिलाएं गाती हुई कहती है कि मानव जीवन बार-बार नहीं मिलता, इसलिए जितना हो सकें इस जीवन के माध्यम से उपकार करते रहना चाहिए। विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से मानव को समझाने की चेष्टा की गई है।-

भंवरा मिल कर मौज उड़ा ले, जिंदगी मिले ना बारम्बार
भंवरा मिले ना दूजी बार, जिंदगी मिले ना बारम्बार
भंवरा मिल कर मौज उड़ा ले, जिंदगी मिले ना बारम्बार
प्रीत करो तो ऐसी कर जो, जैसे रूई कपासा
जीवता जीवे तो तन को ढंकता, मर्या पे कफन औडाए
भंवरा मिल कर मौज उड़ा ले, जिंदगी मिले ना बारम्बार
प्रीत करो तो ऐसी कर जो, जैसे लोटा, डोर
अपना कंठ तो बांध लिया रे, तुझको दिया पिलाय
भंवरा मिल कर मौज उड़ा ले, जिंदगी मिले ना बारम्बार
प्रीत करो तो ऐसी कर जो, जैसे दीया, जोत
अपने तन को जला दिया रे, तुझको दिया उजास
भंवरा मिल कर मौज उड़ा ले, जिंदगी मिले ना बारम्बार


       मानव जीवन मिलना हीरे के समान अमूल्य बताते हुए महिलाएं गाती है कि इस हीरे रूपी मनुष्य जीवन को सांसारिकता की मिट्टी में मिला कर यूं ही बरबाद नहीं करना चाहिए। यह जीवन बहुत छोटा और पानी के बुलबुले के समान क्षणिक है जो कभी भी खत्म हो सकता है। इसकी सार्थकता इसी में है कि तुम सबके साथ अच्छा व्यवहार करो और अपनी जिंदगी को सार्थक बनाओ।

तेरा मनुष जनम अनमोल रे, तू माटी में मत रोल रे
अब तो मिला है, फिर ना मिलेगा
कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं
तू बुदबुदा है पानी का, मत कर तू गर्व जवानी का
एक कमाई कर ले रे भाई, पता नहीं जिंदगानी का
तू मीठा सब से बोल रे, तू माटी में मत रोल रे
अब तो मिला है फिर ना मिलेगा
कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं
तेरा मनुष जनम........

      तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में लिखा है ‘कर्म प्रधान विश्व रचि राखा’ अर्थात मनुष्य जैसे कर्म करता है उसी के अनुसार उसका जीवन निर्धारित होता है। मालवी के इस भजन में यही बात कही गई है कि कर्म के अनुसार मनुष्य की अलग-अलग गति होती है। अपने कर्म के माध्यम से मनुष्य अपना भाग्य स्वयं बनाता है। इसलिए उसे अपने कर्माे के अनुसार ही जन्म प्राप्त होता है दृ 

ओ संता मत दीजो माता बाई ने दोस,
करमा री गति न्यारी-न्यारी
ओ संता मत दीजो जामण जाई ने दोस,
करमा री गति न्यारी-न्यारी.....
ओ संता एक माटी रा करवा चार
चारा री गति न्यारी-न्यारी
ओ संता पेलो है दूध केरा ठाम
दूजो है दही के री जामणी
ओ संता तीजो है पाणी रोपा ने
चौथो जंगल रूठियो
ओ संता मत दीजो माता...
ओ संता एक बेला रा तुम्बा चार
चारा री गति न्यारी-न्यारी
ओ संता पेलो है तन्दुरा री तान
दूजा में जल बरस्या
ओ संता तीजो है सतगुरु रे हाथ
चौथो तो बेले लागियो
ओ संता मत दीजो माता...

      इस तरह हम देखते हैं कि लोकजीवन में व्याप्त लोकगीतों का संसार सत्य का संसार है। इन लोकगीतों में जीवन का दर्शन समाहित है। देख जाए तो लोकगायक के अन्तरभावों का वास्तविक चित्रण वहाँ रहता है। जटिलता, दुरूहता और गोपनीयता का लोकगीतों में नितान्त अभाव रहता है। हृदय में उत्पन्न होने वाले राग-विराग के सीधे-सच्चे भावों का सीधा और निश्चल प्रकटीकरण लोकगीतों की सबसे बड़ी विशेषता है। कृत्रिम साज-सज्जा से परे स्वाभाविक उक्तियों का सौंदर्य वहां लक्षित होता है। लोकगीत की उस विशाल और व्यापक सौंदर्य राशि के समक्ष संसार की सम्पूर्ण कृत्रिमता तुच्छ है।9 

संदर्भ - 
1. गीत लोक जीवन-स्पंदन की कलात्मक अभिव्यक्ति, यायावरी मासिक पत्रिका, जनवरी, 2014 
2. रामनरेश त्रिपाठी -कविता कौमुदी (परिवर्धित संस्करण) तीसरा भाग  (ग्राम गीत) पृष्ठ - 78
3. मालवी भाषा और साहित्य-म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी, संपादक- डॉ. हरिमोहन बुधोलिया, पृष्ठ- 10
4. डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित, मालवी संस्कृति और साहित्य, पृष्ठ- 407
5. मदनेन विना कृता रतिः क्षणमात्रं कितस जीवतीति मे।
  अर्चनीयमिदं व्यवस्थितं रमणा, त्वामनुयामि यद्यपि।।  कालिदास, कुमारसंभव  
6. हा नाथ प्रिय धर्मज्ञ करूणानाथ वत्सल।
   त्वया हतेन निहता वयं ते सगृहप्रथाः।।
   त्वया विरहिता पत्या पुरीयं पुरूषषम।
   न षोभते व्यभिव निवृतोत्सव मंगवा।। - श्रीमद्भागवत, दशमस्कन्ध, अध्याय 44, श्लोक 44-45 
7. उंतजपतमदहव जीम जनकल व विसोवदहे. चंहम - 27     
8. विद्या चौहान-लोकगीतों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, कानपुर ।
9. पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी-हिंदी साहित्य की भूमिका, पृष्ठ- 138
10. काया भजन संकलन - 1. अयोध्या ठन्ना, रतलाम 2. द्वारका गलगामा, खेड़ावदा, उज्जैन 3. निर्मला धाकड़, डोसीगांव, रतलाम, 4. आनंदी धाकड़, साजोद, धार, आदि।   
   
स्वर्णलता शोध अध्येता (हिंदी) हिंदी अध्ययनशाला उज्जैन।
पता- 84, गुलमोहर कालोनी,रतलाम (म.प्र.)457001,swrnlata@yahoo.in
साभार:अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati),  वर्ष-2, अंक-18, अप्रैल-जून, 2015

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