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शनिवार, 22 अगस्त 2015

muktak

एक मुक्तक:
संजीव 
*
अहमियत न बात को जहाँ मिले 
भेंट गले दिल-कली नहीं खिले 
'सलिल' वहां व्यर्थ नहीं जाइए
बंद हों जहाँ ह्रदय-नज़र किले
*

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