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शनिवार, 22 अगस्त 2015

parody

एक पैरोडी :
संजीव 
*
उड़ चले हम विदेशों को हँस साथियों 
जो भी बोलें सुनों होके चुप साथियों 
*
सांसदों ज़िद करो मुख न खोलेंगे हम
चाहे कितना कहो कुछ न बोलेंगे हम
काम हो या न हो कोई अंतर नहीं
जैसा चाहें जिसे वैसा तौलेंगे हम
पद न छोड़ेगा कोई कभी साथियों
उड़ चले हम विदेशों को हँस साथियों
*
हम सभाओं में गरजेंगे, बरसेंगे हम
चोट तुम पे करें, तुमको वरजेंगे हम
गोलियाँ सरहदों पे चलें गम नहीं
ईंट-पत्थर की नीति ही बरतेंगे हम
केजरी को न दम लेने दो साथियों
उड़ चले हम विदेशों को हँस साथियों
*
सब पे कीचड़ उछालेंगे हम रोज ही
दिन हैं अच्छे कहाँ, मत करें खोज भी
मन की बातें करें हम, न तुम बोलना
जन उपासे रहो, हम करें भोज भी
कोई सुविधा न छोड़ें कभी साथियों
***

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