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शनिवार, 5 सितंबर 2015

alankar charcha 5

अलंकार चर्चा: ५
वृत्त्यनुप्रास अलंकार
संजीव
*
हो एकाधिक वर्ण का, एकाधिक दुहराव
वृत्त्यनुप्रास पढ़ें 'सलिल', मन में हो जब चाव
जब काव्य पंक्तियों में एक या एकाधिक वर्णों की एक से अधिक बार आवृत्ति होती है तो वहाँ वृत्त्यनुप्रास अलंकार होता है।
उदाहरण:
०१. अजर अमर अक्षर अजित, अमित अनादि अनंत
अटल अचल असुरारि हे!, अगमागम अरि-अंत
यहाँ 'अ' वर्ण की अनेक आवृत्तियाँ हैं.
०२. नेह निनादित नर्मदा
शाश्वत शिवजा शर्मदा
वारि वाहिनी वर्मदा
यहाँ 'अ', 'ष' तथा 'व् ' वर्णों की अनेक आवृत्तियाँ हैं.
०३. फिर जमीं पर कहीं काफ़िर कहीं क़ादिर क्यों है?
फिर जमीं पर कहीं नाफ़िर, कहीं नादिर क्यों है??
कौन किसका है सगा, और किसे गैर कहें
फिर जमीं पर कहीं ताइर, कहीं ताहिर क्यों है?
(काफ़िर = नास्तिक, कादिर = समर्थ ईश्वर, नाफ़िर = घृणा करनेवाला, नादिर = श्रेष्ठ, ताइर = उड़नेवाला, ताहिर = पवित्र)
०४. चंचल चित्त
नचाता नाचे नर
चकराया है.
०५. जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है
वह नर नहीं नरपशु निरा है और मृतक समान है -मैथिली शरण गुप्त
भारतीय काव्य के अंतर्गत ३ वृत्तियाँ मान्य हैं.
१. मधुरा या उपनागरिका
२. कोमला तथा
३. परुषा।
मधुरा वृत्ति में मधुर संगीतमय वर्णों (न, म, च वर्ग) की आवृत्ति होती है। 'ट' वर्ग को छोड़कर शेष सभी वर्णों की सानुनासिक रूप में आवृत्ति इसके अंतर्गत मान्य हैं।
कोमला वृत्ति में य, र, ल, व, ष वर्णों की आवृत्ति तथा अल्प समासयुक्त पद मान्य हैं।
परुषा वृत्ति के अंतर्गत परुष वर्णों ट, ठ, ड, ढ तथा संयुकताक्षरों की आवृत्ति होती है।
इनके आधार पर वृत्यनुप्रास के ३ भेद हैं।
१. मधुर वृत्यनुप्रास: जब च, न, म आदि वर्गों की कई आवृत्ति हों।
उदाहरण:
१. तुम मृदु मानस के भाव और मैं मनोरञ्जिनी भाषा
निराला -परिमल
२. कंकण किंकिणि नुपुर धुनि सुनि, कहत लखन सन राम हृदय गुनि
- तुलसी, मानस
३. चारु चन्द्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में
मैथिली शरण गुप्त, -पंचवटी
४. मंदिर-मस्जिद में मुदित, मन खोजे मन-मीत
मन मथ मन्मथ दूर कर, 'सलिल' यही है रीत
२. कोमल वृत्यनुप्रास: जहाँ कोमल वर्णों यथा प, ब, य, र, ल, व, स में से किसी की अनेक बार आवृति हो।
उदाहरण:
१. पी-पी टेर पपीहरा, बार-बार थक मौन
बेबस के बस में नहीं, मिलन बताये कौन?
प तथा ब की कई आवृत्तियाँ हैं.
२. हिलते द्रुमदल कल किसलय देती गलबाँही डाली
फूलों का चुम्बन छिड़ती, मधुपों की तान निराली
देखें: ल की अनेक आवृत्तियाँ
३. सरस-सरल सरिता सदृश, प्रवहित कविता-धार
दरस-परस रस-रास है, तरस न कर दीदार
र तथा स की आवृत्तियों पर ध्यान दें
३. परुष वृत्यनुप्रास: जब ट वर्ग (ट, ठ, ड, ढ. ण) या संयुकताक्षरों की अनेक बार आवृत्तियाँ हों।
उदाहरण:
१. टका धरम टका करम, टका ही इष्ट देवता
टका न जिसको मिला सका, टक एक टका देखता
'ट' की आवृत्तियाँ
२. ठठा हँसे लड़के हुई, वृद्धा अतिशय रुष्ट
'ठठरी बँधे' विलाप कर, मन ही मन संतुष्ट
३. सब जात फ़टी दुःख की दुपटी, कपटी न रहैं जहँ एक घटी
निघटी रूचि मीचु घटी हू घटी, सब जीव जतीन की छूटी तटी
अघ ओघ की बेड़ी कटी निकटी, निकटी प्रकटी गुटु ज्ञान गटी
चहुँ ओरन नाचत मुक्ति नटी, गुन धूर जटी बन पंचवटी
***
टीप: आवृत्ति के वर्ण शब्द में कहीं भी हो सकते हैं.
आप अलंकार का प्रयोग करती अपनी तथा अन्यों की काव्य पंक्तियाँ टिप्पणी में प्रस्तुत करें. अन्य की पंक्तियों के साथ रचनाकार का नाम तथा पुस्तक का नाम दें.

1 टिप्पणी:

Karishma Sharma ने कहा…

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