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मंगलवार, 15 सितंबर 2015

चित्र पर रचना :

चित्र पर रचना:
यहाँ प्रस्तुत चित्र पर हिंदी के किसी प्रसिद्ध कवि की शैली में लिखिए। संभव हो तो मूल रचना भी दें. अपनी रचना भी प्रस्तुत कर सकते हैं. कितनी भी प्रविष्टियाँ दे सकते हैं किन्तु शालीनता और मौलिकता आवश्यक है.
रचनाकार: संजीव
*
शैली : बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'
राधावत, राधसम हो जा, रे मेरे मन,
पेंग-पेंग पायेगा , राधा से जुड़ता तन
शुभदा का दर्शन कर, जग की सुध बिसार दे
हुलस-पुलक सिहरे मन, राधा को निहार ले
नयनों में नयनों देखे मन सितार बज
अग-जग की परवा ताज कर, जमुना जल मज्जन
राधावत, राधसम हो जा, रे मेरे मन
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मूल पंक्तियाँ:
अंतर्मुख, अंतर्मुख हो जा, रे मेरे मन,
उझक-उझक देखेगा तू किस-किसके लांछन?
कर निज दर्शन, मानव की प्रवृत्ति को निहार
लख इस नभचारी का यह पंकिल जल विहार
तू लख इस नैष्ठि का यह व्यभिचारी विचार,
यह सब लख निज में तू, तब करना मूल्यांकन
अंतर्मुख, अंतर्मुख हो जा, रे मेरे मन.
हम विषपायी जनम के, पृष्ठ १९
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शैली : वीरेंद्र मिश्र
जमुन तट रसवंत मेला,
भूल कर जग का झमेला,
मिल गया मन-मीत, सावन में विहँस मन का।

मन लुभाता संग कैसे,
श्वास बजती चंग जैसे,
हुआ सुरभित कदंबित हर पात मधुवन का।

प्राण कहता है सिहर ले,
देह कहती है बिखर ले,
जग कहे मत भूल तू संग्राम जीवन का।

मन अजाने बोलता है,
रास में रस घोलता है,
चाँदनी के नाम का जप चाँद चुप मनका।
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मूल रचना-
यह मधुर मधुवन्त वेला,
मन नहीं है अब अकेला,
स्वप्न का संगीत कंगन की तरह खनका।

साँझ रंगारंग है ये,
मुस्कुराता अंग है ये,
बिन बुलाये आ गया मेहमान यौवन का।

प्यार कहता है डगर में,
बाह नहीं जाना लहर में,
रूप कहता झूम जा, त्यौहार है तन का।

घट छलककर डोलता है,
प्यास के पट खोलता है,
टूट कर बन जाय निर्झर, प्राण पाहन का।
अविरल मंथन, सितंबर २०००, पृष्ठ ४४
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शैली : डॉ. शरद सिंह
आ झूले पर संग झूलकर, धरा-गगन को एक करे
जमुना जल में बिंब देखकर, जीवन में आनंद भरें

ब्रिज करील वन में गुंजित है, कुहू कुहू कू कोयल की
जैसे रायप्रवीण सुनाने, कजरी मीठी तान भरे

रंग कन्हैया ने पाया है, अंतरिक्ष से-अंबर से
ऊषा-संध्या मौक़ा खोजें, लाल-गुलाबी रंग भरे

बाँहों में बाँहें डालो प्रिय!, मुस्का दो फिर हौले से
कब तक छिपकर मिला करें, हम इस दुनिया से डरे-डरे

चलो कोर्ट मेरिज कर लें या चल मंदिर में माँग भरूँ
बादल की बाँहों में बिजली, देख-देख दिल जला करे  

हममें अपनापन इतना है, हैं अभिन्न इक-दूजे से
दूरी तनिक न शेष रहे अब, मिल अद्वैत का पंथ वरे
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मूल रचना-
रात चाँद की गठरी ढोकर, पूरब-पश्चिम एक करे
नींद स्वप्न के पोखर में से, अँजुरी-अँजुरी स्वप्न भरे

घर के आँगन में फ़ैली है, आम-नीम की परछाईं
जैसे आँगन में बिखरे हों, काले-काले पात झरे

उजले रंग की चादर ओढ़े, नदिया सोई है गुपचुप
शीतल लहरें सोच रही हैं, कल क्या होगा कौन डरे?

कोई जब सोते-सोते में, मुस्का दे यूँ हौले से
संझो उसने देख लिये हैं काले आखर हरे-हरे

बड़ा बृहस्पति तारा चमके, जब मुँडेर के कोने पर
ऐसा लगता है छप्पर ही, खड़ा हुआ है दीप धरे

यूँ तो अपनापन सिमटा है, मंद हवा के झोंकें में
फिर भी कोई अपना आये, कहता है मन राम करे!
प्रयास दिसंबर २००७, पृष्ठ ११
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शैली: ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान (सुभद्रा कुमारी चौहान के पति)
प्रिय! सरस सहेली नटखट हो,
           ज्यों कली अधखिली खिली हुई
चंपई रंग, मृगनयनी तुम,
                  रति सी साँचे में ढली हुई
बरसाने की गोरी छोरी
              आ मिली दैव! यह भली हुई
पल में रूठे, पल में माने
                  बाहों में मिसरी-डली हुई
सुधियों का झूला झूलें हम
             छलके खुशियों की गागरिया
मैं हुआ बावरा देखा तुझे
                  तू मुझे देख है बावरिया
ब्रज धूल यहाँ, जल-कूल यहाँ
           रस-रास रचायें मिलकर हम
तन-वीणा पर मन रागिनी के
          कुछ राग सुनाएँ खिलकर हम
खिलखिला चन्द्र-चन्द्रिका पड़े
                  गोरी! मैं तेरा साँवरिया
तज द्वैत, वरो अद्वैत सखे!
                मैं नटनागर तू नागरिया
मन-प्राणों के अनुबंध हुए
           हँस पड़ी पुलक ब्रज की माटी
मन-मंदिर में घट-ज्योति जली
           जो मिटी, बनी फिर परिपाटी
जप-जोग व्यर्थ, सुख-सोग व्यर्थ
         भव-भोग व्यर्थ, संयम है सच
नैकट्य-दूरियाँ बेमानी
      मैं-तुम का विलय, हुआ हम सच
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मूल रचना-
मैं और तुम
(सुभद्रा जी पर पति ठाकुर लक्ष्मण सिंह
चौहान द्वारा रचित रचना)
*
वह ठिठक-अड़ैली चंचल थी,
           ज्यों प्रीति-लाज में घुली हुई
थी हँसी रसीले होंठों की,
              नवरूप-सुधा से धुली हुई
वह अजब छबीली चितवन थी
            था तरल वेग पर तुली हुई
उन घनी लचीली पलकों में,
        कुछ छिपी हुई, कुछ खुली हुई
है याद  मुझे,मैं चौंक पड़ा,
          बज उठी हृदय की बाँसुरिया
वह दृष्टि तुम्हारी गाती थी
            'मैं राधा हूँ तुम साँवरिया'.
ये शब्द कहाँ?, पद-वाक्य कहाँ?
             बस भाव सुनाई देता था
था राग अहा, अनुराग बना
               साकार दिखाई देता था
पूर्णेन्दु उमा, नव पुष्प खिले
        हाँ, लगी कुहकने कोयलिया
यों पूजा का सामान जुटा
          मैं राधा था, तुम साँवरिया
दो एक हुए, स्वच्छंद बने
         मिल गयी राह आजादी की
जग-मंदिर मंजुल गूँज उठा
            सुन पड़ी बधाई शादी की
आलोक हुआ, भ्रम लोप हुआ
      क्या दीख पड़ा, मैं था तुम थीं
मैं विश्व बना तुम विश्वात्मा
       मैं तुममें था, तुम मुझमें थीं
***

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