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रविवार, 6 सितंबर 2015

kruti charcha

कृति चर्चा:
'खुशबू सीली गलियों की' : प्राण-मन करती सुवासित  
चर्चाकार: संजीव 
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[कृति विवरण: खुशबू सीली गलियों की, नवगीत संग्रह, सीमा अग्रवाल, २०१५, आकार डिमाई, आवरण पेपरबैक, बहुरंगी, पृष्ठ ११२, १२०/-, अंजुमन प्रकाशन, ९४२ आर्य कन्या चौराहा, मुट्ठीगंज, इलाहाबाद , गीतकार संपर्क: ७५८७२३३७९३]

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भाषा और साहित्य समाज और परिवेश के परिप्रेक्ष्य में सतत परिवर्तित होता है. गीत मनुष्य के मन और जीवन के मिलन से उपजी सरस-सार्थक अभिव्यक्ति है रस और अर्थ न हो तो गीत नहीं हो सकता। गीतकार के मनोभाव शब्दों से रास करते हुए कलम-वेणु से गुंजरित होकर आत्म को आनंदित कर दे तो गीत स्मरणीय हो जाता है। 'खुशबू सीती गलियों की' की गीति रस-छंद-अलंकार की त्रिवेणी में अवगाहन कर नव वसन धारण कर नवगीत की भावमुद्रा में पाठक का मन हरण करने में सक्षम हैं 

गीत और अगीत का अंतर मुखड़े और अंतरे पर कम और कथ्य की प्रस्तुति के तरीके पर अधिक निर्भर है।सीमा जी की ये रचनायें २ से ५ पंक्तियों के मुखड़े के साथ २ से ५ अंतरों का संयोजन करते हैं अपवाद स्वरूप 'झाँझ हुए बादल' में  ६ पंक्तियों के २ अंतरे मात्र हैं केवल अंतरे का मुखड़ाहीन गीत नहीं है शैल्पिक नवता से अधिक महत्त्वपूर्ण कथ्य और छंद की नवता होती है जो नवगीत के तन में मन बनकर निवास करती और अलंकृत होकर पाठक-श्रोता के मन को मोह लेती है 

सीमा जी की यह कृति पारम्परिकता की नींव पर नवता की भव्य इमारत बनाते हुए निजता से उसे अलंकृत करती है ये नवगीत चकित या स्तब्ध नहीं आनंदित करते हैं. धार्मिक, सामाजिक, राष्ट्रीय पर्वों-त्यहारों की विरासत सम्हालते ये गीत आस्मां में उड़ान भरने के पहले अपने कदम जमीन पर मजबूती से जमाते हैं यह मजबूती देते हैं छंद अधिकाँश नवगीतकार छंद के महत्व को न आंकते हुई नवता की तलाश में छंद में जोड़-घटाव कर अपनी कमाई छिपाते हुए नवता प्रदर्शित करने का प्रयास करते हुई लड़खड़ाते हुए प्रतीत होते हैं किन्तु सीमा जी की इन नवगीतों को हिंदी छंद के मापकों से परखें या उर्दू बह्र के पैमाने पर निरखें वे पूरी तरह संतुलित मिलते हैं पुरोवाक में श्री ओम नीरव ने ठीक ही कहा है कि सीमा जी गीत की पारम्परिक अभिलक्षणता को अक्षुण्ण रखते हुए निरंतर नवल भावों, नवल प्रतीकों, नवल बिम्ब योजनाओं और नवल शिल्प विधान की उद्भावना करती रहती हैं 

 'दीप इक मैं भी जला लूँ' शीर्षक नवगीत ध्वनि खंड २१२२ (फाइलातुन) पर आधारित है  [संकेत- । = ध्वनि खंड विभाजन, / = पंक्ति परिवर्तन, रेखांकित ध्वनि लोप या गुरु का लघु उच्चारण]   

तुम मुझे दो । शब्द / औ मैं /। शब्द को गी। तों में ढालूँ 
  २  १२   २  ।  २ १ /   २   २ /।   २ १  २  २ ।  २  १  २२   = २८ मात्रा 
बरसती रिम । झिम की / हर इक । बूँद में / घुल । कर बहे जो 
 २  १ २   २  ।    २     १ /  २   २  ।  २ १ २  /  २ ।   २  १२  २  = २८ मात्रा 
थाम आँचल । की किनारी ।/ कान में / तुम । ने कहे जो  
 २  १  २  २  ।   २  १  २  २ ।/ २ १  २  / २  ।  २  १२   २  = २८ मात्रा 
फिर उन्हीं निश्  छल  पलों को।/  तुम कहो तो ।/ आज फिर से  
  २   १  २   २   ।   २    १  २  २ ।/   २   १  २  २ ।/  २ १   २   २  = २८ मात्रा  
 गुनगुना लूँ  । तुम मुझे दो । शब्द
  २   १ २  २  ।  २    १ २  २ ।  २ १   = १७ मात्रा 
ओस भीगी । पंखुरी सा / मन सहन / निख ।  रा  है  ऐसे 
 २ १   २ २  ।  २१२   २ । / २    १ २  /    २   । २  १  २ २ = २८ मात्रा 
स्वस्ति श्लोकों । के मधुर स्वर । / घाट पर / बिख। रे हों जैसे
  २  १    २  २ ।  २  १  २    २  । / २ १   २ /    २  ।  २ १ २२ = २८ मात्रा 
नेह की मं । दाकिनी में ।/ झिलमिलाता ।/ दीप इक  = २६ मात्रा    
 २ १ २  २ ।  २ १  २  २ ।/    २   १ २  २ ।/   २१  २   
मैं । भी जला लूँ । तुम मुझे दो । शब्द
२ ।  २  १  २  २    २    १ २ २ ।  २ १ = १९ मात्रा   

इस नवगीत पर उर्दू का प्रभाव है। 'और' को औ' पढ़ना, 'की' 'में' 'है' तथा 'हों' का लघु उच्चारण व्याकरणिक दृष्टि से विचारणीय है ऐसे नवगीत गीत हिंदी छंद विधान के स्थान पर उर्दू बह्र के आधार पर रचे गये हैं 
इसी बह्र पर आधारित अन्य नवगीत 'उफ़! तुम्हारा / मौन कितना / बोलता है',  अनछुए पल / मुट्ठियों में / घेर कर', हर घड़ी ऐ/से जियो जै/से यही बस /खास है',  पंछियों ने कही / कान में बात क्या? आदि हैं 

पृष्ठ ७७ पर हिंदी पिंगल के २६ मात्रिक महाभागवत जातीय गीतिका छंद पर आधारित नवगीत [प्रति पंक्ति में १४-१२ मात्राएँ तथा पंक्त्याँत में लघु-गुरु अनिवार्य]  का विश्लेषण करें तो इसमें २१२२ ध्वनि खंड की ३ पूर्ण तथा चौथी अपूर्ण आवृत्ति समाहित किये है स्पष्ट है कि उर्दू बह्रें हिंदी छंद की नीव पर ही खड़ी की गयी हैं. हिंदी में गुरु का लघु तथा लघु का गुरु उच्चारण दोष है जबकि उर्दू में यह दोष नहीं है. इससे रचनाकार को अधिक सुविधा तथा छूट मिलती है
कौन सा पल । ज़िंदगी का ।/ शीर्षक हो । क्या पता?  
 २ १  २   १   ।  २  १  २  २ ।  २ १ २ २   । २ १ २    = १४ + १२ = २६ मात्रा 
हर घड़ी ऐसे जियो /जै।/से यही बस । खास है 
 २  १ २  १।२  १  २  २ ।/ २ १ २  २  ।  २ १   २    = १४ + १२ = २६ मात्रा 

'फूलों का मकरंद चुराऊँ / या पतझड़ के पात लिखूँ' पृष्ठ ९८ में महातैथिक जातीय लावणी (१६-१४, पंक्यांत में मात्रा क्रम बंधन नहीं) का मुखड़ा तथा स्थाई हैं जबकि अँतरे में ३२ मात्रिक लाक्षणिक  प्रयोग है जिसमें पंक्त्यांत में लघु-गुरु नियम को शिथिल किया गया है  

'गीत कहाँ रुकते हैं / बस बहते हैं तो बहते हैं' - पृष्ठ १०९ में २८ मात्रिक यौगिक जातीय छंदों का मिश्रित प्रयोग है। मुखड़े में १२= १६, स्थाई में १४=१४ व १२ + १६  अंतरों में १६=१२, १४=१४, १२+१६  संयोजनों का प्रयोग हुआ है। गीतकार की कुशलता है  कि कथ्य के अनुरूप छंद के विधान में विविधता होने पर भी लय तथा रस प्रवाह अक्षुण्ण है

'बहुत दिनों के बाद' शीर्षक गीत पृष्ठ ९५ में मुखड़ा 'बहुत दिनों के बाद / हवा फिर से बहकी है' में रोला (११-१३)  प्रयोग हुआ है किन्तु स्थाई में 'गौरैया आँगन में / आ फिर से चहकी है, आग बुझे चूल्हे में / शायद फिर दहकी है तथा थकी-थकी अँगड़ाई / चंचल हो बहकी है' में  १२-१२ = २४ मात्रिक अवतारी जातीय दिक्पाल छंद का प्रयोग है जिसमें पंक्त्यांत में लघु-गुरु-गुरु का पालन हुआ है। तीनों अँतरेरोल छंद में हैं  

'गेह तजो या देवों जागो / बहुत हुआ निद्रा व्यापार' पृष्ठ ६३ में आल्हा छंद (१६-१५, पंक्त्यांत गुरु-लघु) का प्रयोग करने का सफल प्रयास कर उसके साथ सम्पुट लगाकर नवता उत्पन्न करने का प्रयास हुआ है। अँतरे ३२ मात्रिक लाक्षणिक जातीय मिश्रित छंदों में हैं

'बहुत पुराना खत हाथों में है लेकिन' में  २२ मात्रिक महारौद्र जातीय छंद में मुखड़ा, अँतरे व स्थाई हैं किन्तु यति १०,  १२ तथा ८ पर ली गयी है यह स्वागतेय है क्योंकि इससे विविधता तथा रोचकता उत्पन्न हुई है

सीमा जी के नवगीतों का सर्वाधिक आकर्षक पक्ष उनका जीवन और जमीन से जुड़ाव है वे कपोल कल्पनाओं में नहीं विचरतीं इसलिए उनके नवगीतों में पाठक / श्रोता को अपनापन मिलता है। आत्मावलोकन और आत्मालोचन ही आत्मोन्नयन की राह दिखाता है। 'क्या मुझे अधिकार है?' शीर्षक नवगीत इसी भाव से प्रेरित है। 

'रिश्तों की खुशबु', 'कनेर', 'नीम', 'उफ़ तुम्हारा मौन', 'अनबाँची रहती भाषाएँ', 'कमला रानी', 'बहुत पुराना खत' आदि नवगीत इस संग्रह की पठनीयता में वृद्धि करते हैं। सीमा जी के इन नवगीतों का वैशिष्ट्य प्रसाद गुण संपन्न, प्रवाहमयी, सहज भाषा है। वे शब्दों को चुनती नहीं हैं, कथ्य की आवश्यकतानुसार अपने आप  हैं इससे उत्पन्न प्रात समीरण की तरह ताजगी और प्रवाह उनकी रचनाओं को रुचिकर बनाता है। लोकगीत, गीत और मुक्तिका (हिंदी ग़ज़ल) में अभिरुचि ने अनजाने ही नवगीतों में छंदों और बह्रों  समायोजन करा दिया है। 

तन्हाई की नागफनी, गंध के झरोखे, रिवाज़ों का काजल, सोच में सीलन, रातरानी से मधुर उन्वान, धुप मवाली सी, जवाबों की फसल, लालसा के दाँव, सुर्ख़ियों की अलमारियाँ, चन्दन-चंदन बातें, आँचल की सिहरन, अनुबंधों की पांडुलिपियाँ आदि रूपक  छूने में समर्थ हैं. 

इन गीतों में सामाजिक विसंगतियाँ,  वैषम्य से जूझने का संकल्प, परिवर्तन की आहट, आम जन की अपेक्षा, सपने, कोशिश का आवाहन, विरासत और नव सृजन हेतु छटपटाहट सभी कुछ है। सीमा जी के गीतों में आशा का आकाश अनंत है: 
पत्थरों के बीच इक / झरना तलाशें 
आओ बो दें / अब दरारों में चलो / शुभकामनाएँ 
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टूटती संभावनाओं / के असंभव / पंथ पर 
आओ, खोजें राहतों की / कुछ रुचिर नूतन कलाएँ 
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उनकी अभिव्यक्ति का अंदाज़ निराला है:
उफ़, तुम्हारा मौन / कितना बोलता है  
वक़्त की हर शाख पर / बैठा हुआ कल
बाँह में घेरे हुए मधुमास / से पल 
अहाते में आज के / मुस्कान भीगे 
गंध के कितने झरोखे / खोलता है 
तुम अधूरे स्वप्न से / होते गए 
और मैं होती रही / केवल प्रतीक्षा 
कब हुई ऊँची मुँडेरे / भित्तियों से / क्या पता? 
दिन निहोरा गीत / रचते रह गए 
 रातें अनमनी / मरती रहीं / केवल समीक्षा 
 'कम लिखे से अधिक समझना' की लोकोक्ति सीमा जी के नवगीतों के संदर्भ में सटीक प्रतीत होती है। नवगीत आंदोलन में आ रहे बदलावों के परिप्रेक्ष्य में कृति का महत्वपूर्ण स्थान है. अंसार क़म्बरी  कहते हैं: 'जो गीतकार भाव एवं संवेदना से प्रेरित होकर गीत-सृजन करता है वे गीत चिरंजीवी एवं ह्रदय उथल-पुथल कर देने वाले होते हैं' सीमा जी के गीत ऐसे ही हैं। 

सीमाजी के अपने शब्दों में: 'मेरे लिए कोई शै नहीं जिसमें संगीत नहीं, जहाँ पर कोमल शब्द नहीं उगते , जहाँ भावों की नर्म दूब नहीं पनपती।हंसी, ख़ुशी, उल्लास, सकार निसर्ग के मूल भाव तत्व है, तभी तो सहज ही प्रवाहित होते हैं हमारे मनोभावों में मेरे शब्द इन्हें ही भजना चाहते हैं, इन्हीं का कीर्तन चाहते हैं।' 
यह कीर्तन शोरोगुल से परेशान आज के पाठक के मन-प्राण को आनंदित करने समर्थ है. सीमा जी की यह कीर्तनावली नए-नए रूप लेकर पाठकों को आनंदित करती रहे.
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1 टिप्पणी:

sag ने कहा…

सार्थक समीक्षा हेतु हृदय से धन्यवाद सलिल जी . .... आज नए नवगीतकारों को इस तरह की ही समीक्षा की आवश्यकता है जो बिना हतोत्साहित किये हुए सुधार के सही संकेत दे .......... आपके इस यज्ञ को नमन ......सीमा अग्रवाल .....