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रविवार, 27 सितंबर 2015

shlesh alankar ke sartaj senapati

विशेष आलेख: 

श्लेष अलंकार के सरताज सेनापति 

*
भारत में पश्चिम की तरह व्यक्ति को महत्त्व देकर उसके जीवन के पल-पल का विवरण एकत्र करने की परंपरा नहीं है. मूल्यों को सनातन और व्यक्ति की काया को नश्वर मानकर उसकी कार्य-परंपरा को आगे बढ़ाना ही भारत में साध्य रहा है. इसीलिए अप्रतिम ज्ञान के भण्डार वेदों के रचयिता अज्ञात हैं. प्रतिलिप्याधिकार (कॉपीराइट) की मान्यता तो दूर कल्पना भी भारत में नहीं की गयी. 

हिंदी-साहित्य के जिन महत्वपूर्ण कवियों के कृतित्त्व प्राप्त हैं, परंतु व्यक्तित्त्व अज्ञात  है उनमें से एक भक्तिकाल-रीतिकाल के संधिकाल में हुए कवि 'सेनापति' के विषय में  मात्र एक कवित्त प्राप्त है:


"दीक्षित परसराम, दादौ है विदित नाम, जिन कीने यज्ञ, जाकी जग में बड़ाई है।
गंगाधर पिता, गंगाधार ही समान जाकौ, गंगातीर बसति अनूप जिन पाई है।
महाजानि मनि, विद्यादान हूँ कौ चिंतामनि, हीरामनि दीक्षित पै तैं पाई पंडिताई है।
सेनापति सोई, सीतापति के प्रसाद जाकी, सब कवि कान दै सुनत कविताई हैं॥"


सेनापति पर शोध कर चुके डॉ. चंद्रपाल शर्मा के अनुसार : "अनूपशहर-निवासी ९० वर्षीय वयोवृद्ध पंडित मंगलसेनजी ने हमें सन १९७० में बताया था कि उन्होंने अपने पिता से बचपन में सुना था कि सेनापति के पिता अनूपशहर में लकड़ी के मुनीम बनकर आये थे। …….. अनूपशहर की 'हिंदी साहित्य परिषद' ने जिस स्थान पर 'सेनापति-स्मारक बनवाया है वह स्थान भी मंगलसेनजी ने अपने पिता से सेनापति के मकान के रूप  में ही सुना था।"

सेनापति के विषय में कोई पुष्ट प्रमाण नहीं हैं फिर भी अनूपशहर में सम्मानस्वरुप सेनापति-स्मारक बनाया हुआ है और श्रद्धांजलि स्वरूप हर साल शरद-पूर्णिमा को कवि-सम्मेलन का आयोजन किया जाता रहा है। उस मंच से राष्ट्र-कवि सोहनलाल द्विवेदी जैसी महान विभूतियाँ कविता पाठ करके महाकवि सेनापति को अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित कर चुकी हैं।

सेनापति ने 'काव्य-कल्पद्रुम' (अप्राप्त) और 'कवित्त-रत्नाकर' (एक मात्र प्राप्त)  ग्रंथों कर प्रणयन किया था। डॉ. चंद्रपाल शर्मा ने लिखा है-"सन १९२४ में जब प्रयाग विश्वविद्यालय में हिंदी का अध्ययन-अध्यापन प्रारंभ हुआ, तब कविवर सेनापति के एकमात्र उपलब्ध ग्रंथ 'कवित्त-रत्नाकर' को एम.ए. के पाठ्यक्रम में स्थान मिला था। उस समय इस ग्रंथ की कोई प्रकाशित प्रति उपलब्ध नहीं थी। कुछ हस्तलिखित पोथियाँ एकत्रित करके पढ़ाई प्रारंभ की गई थी। सन १९३५ में प्रयाग विश्वविद्यालय के रिसर्चस्कॉलर पं. उमाशंकर शुक्ल ने एक वर्ष के कठोर परिश्रम के बाद इस ग्रंथ की विविध हस्तलिखित प्रतियों को सामने रखकर एक मान्य प्रति तैयार की थी, जो प्रयाग-विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग ने प्रकाशित करायी थी। '

कवि की निम्नलिखित पंक्तियों के आधार पर 'कवित्त-रत्नाकर' के विषय में माना जाता रहा है कि उन्होंने इसे सत्रहवीं शताब्दी के उतरार्ध में रचा होगा-

"संवत सत्रह सै मैं सेई सियापति पांय, सेनापति कविता सजी, सज्जन सजौ सहाई।"

अपनी कविताई के विषय में कवि ने लिखा है-
"राखति न दोषै पोषे पिंगल के लच्छन कौं, बुध कवि के जो उपकंठ ही बसति है।
जोय पद मन कौं हरष उपजावति, है, तजै को कनरसै जो छंद सरस्ति हैं।
अच्छर हैं बिसद करति उषै आप सम, जातएं जगत की जड़ताऊ बिनसति है।
मानौं छबि ताकी उदबत सबिता की सेना- पति कबि ताकि कबिताई बिलसति हैं॥"
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"तुकन सहित भले फल कौं धरत सूधे, दूरि कौं चलत जे हैं धीर जिय ज्यारी के।
लागत बिबिध पच्छ सोहत है गुन संग, स्रवन मिलत मूल कीरति उज्यारी के।
सोई सीस धुनै जाके उर मैं चुभत नीके' बेग बिधि जात मन मोहैं नरनारी के।
सेनापति कबि के कबित्त बिलसत अति, मेरे जान बान हैं अचूक चापधारी के।"

सेनापति अपनी रचनाओं की श्रेष्ठता तथा उनकी चोरी के प्रति सचेष्ट थे-

"बानी सौ सहित, सुबरन मुँह रहैं जहाँ, धरति बहु भांति अरथ समाज कौ।
संख्या कर लिजै, अलंकार हैं अधिक यामैं, रखौ मति ऊपर सरस ऐसे साज कौं।
सुनै महाराज चोरि होत चार चरन की , तातैं सेनापति कहैं तजि करि ब्याज कौं।
लीजियौं बचाइ ज्यौं चुराबै नाहिं कोई सौपी, बित्त की सी थाति है, कबित्तन की राज कौं।"

 'कवित्त-रत्नाकर' पाँच तरंगों (अध्यायों) में विभक्त तथा कवित्त, छ्प्पय और कुंडली छंदों में रचित ग्रन्थ है

प्रथम तरंग- इसके ९६ पदों में श्रेष्ठ श्लेष-योजना दर्शनीय है। कवि के शब्दों में -

"मूढ़न कौ अगम, सुगम एक ताकौ, जाकी, तीछन अमल बिधि बुद्धि है अथाह की।
कोई है अभंग, कोई पद है सभंग, सोधि, देखे सब अंग, सम सुधा के प्रवाह की।
ज्ञान के निधान , छंद-कोष सावधान जाकी, रसिक सुजान सब करत हैं गाहकी।
सेवक सियापति कौ, सेनापति कवि सोई, जाकी द्वै अरथ कबिताई निरवाह की॥"

दूसरी तरंग के ७४ कवित्त परम्परानुसार श्रंगार से सराबोर हैं-

(१) "लीने सुघराई संग सोहत ललित अंग, सुरत के काम के सुघर ही बसति है।
गोरी नव रस रामकरी है सरस सोहै, सूहे के परस कलियान सरसति है।
सेनापति जाके बाँके रूप उरझत मन, बीना मैं मधुर नाद सुधा बरसति है।
गूजरी झनक-झनक माँझ सुभग तनक हम, देखी एक बाला राग माला सी लसति है॥"
(२) "कौल की है पूरी जाकी दिन-दिन बाढ़ै छवि, रंचक सरस नथ झलकति लोल है।
रहैं परि यारी करि संगर मैं दामिनी सी, धीरज निदान जाहि बिछुरत को लहै।
यह नव नारि सांचि काम की सी तलबारि है, अचरज एक मन आवत अतोल है।
सेनापति बाहैं जब धारे तब बार-बार, ज्यौं-ज्यौं मुरिजात स्यौं, त्यौं अमोल हैं॥"

तृतीय तरंग में ६२ कवित्तों में षडऋतु-वर्णन है-

(१)"तीर तैं अधिक बारिधार निरधार महा, दारुन मकर चैन होत है नदीन कौ।
होति है करक अति बदि न सिराति राति, तिल-तिल बाढ़ै पीर पूरी बिरहिन कौं।
सीरक अधिक चारों ओर अबनई रहै ना, पाऊँरीन बिना क्यौं हूँ बनत धनीन कौं। 
सेनापति बरनी है बरषा सिसिरा रितु, मूढ़न कौ अगम-सुगम परबीन कौं।

(२) "धरयौ है रसाल मोर सरस सिरच रुचि, उँचे सब कुल मिले गलत न अंत है।
सुचि है अवनि बारि भयौ लाज होम तहाँ, भौंरे देखि होत अलि आनंद अनंत है। 
नीकी अगवानी होत सुख जन वासों सब, सजी तेल ताई चैंन मैंन भयंत है।
सेनापति धुनि द्विज साखा उच्चतर देखौ, बनौ दुलहिन बनी दुलह बसंत है।"

चतुर्थ तरंग में ७६ कवित्त हैं जिनमें रामकथा मुक्त रुप में लिखी है।-

"कुस लव रस करि गाई सुर धुनि कहि, भाई मन संतन के त्रिभुवन जानि है।
देबन उपाइ कीनौ यहै भौ उतारन कौं, बिसद बरन जाकी सुधार सम बानी है।
भुवपति रुप देह धारी पुत्र सील हरि आई सुरपुर तैं धरनि सियारानि है।
तीरथ सरब सिरोमनि सेनापति जानि,राम की कहनी गंगाधार सी बखानी है।"

पाँचवी तरंग के ८६ कवित्त में राम-रसायन वर्णन है। इनमें राम, कृष्ण, शिव और गंगा की महिमा का गान है। 'गंगा-महिमा' दृष्टव्य है-

"पावन अधिक सब तीरथ तैं जाकी धार, जहाँ मरि पापी होत सुरपुरपति है।
देखत ही जाकौ भलौ घाट पहिचानियत, एक रुप बानी जाके पानी की रहति है।
बड़ी रज राखै जाकौ महा धीर तरसत, सेनापति ठौर-ठौर नीकी यैं बहति है।
पाप पतवारि के कतल करिबै कौं गंगा, पुन्य की असील तरवारि सी लसति है।"


सेनापति ने अपने काव्य में सभी रसों को अपनाया है। ब्रज भाषा में लिखे पदों में फारसी और संस्कृत के शब्दों का भी प्रयोग किया है। अलंकारों की बात करें तो सेनापति को श्लेष से तो मोह था। अपने काव्य पर भी कवि को गर्व था-

"दोष सौ मलीन, गुन-हीन कविता है, तो पै, कीने अरबीन परबीन कोई सुनि है।
बिन ही सिखाए, सब सीखि है सुमति जौ पै, सरस अनूप रस रुप यामैं हुनि है।
दूसन कौ करिकै कवित्त बिन बःऊषन कौ, जो करै प्रसिद्ध ऐसो कौन सुर-मुनि है।
रामै अरचत सेनापति चरचत दोऊ, कवित्त रचत यातैं पद चुनि-चुनि हैं।"


सेनापति ने तीनों गुणों प्रसाद, ओज और माधुर्य का निर्वाह किया है। माधुर्य का उदाहरण पठनीय है-

"तोरयो है पिनाक, नाक-पल बरसत फूल, सेनापति किरति बखानै रामचंद्र की,
लैकै जयमाल सियबाल है बिलोकी छवि, दशरथ लाल के बदन अरविंद की।
परी प्रेमफंद, उर बाढ़्यो है अनंद अति, आछी मंद-मंद चाल,चलति गयंद की।
बरन कनक बनी बानक बनक आई, झनक मनक बेटी जनक नरिंद्र की।"

शब्द-शक्ति के संदर्भ में देखा जाए तो कवि ने अमिधा को अच्छे से अपनाया है। सेनापति विद्वान तथा काव्य-शिल्प में निष्णात थे,  'मिश्र-बंधुओं' ने उन्हें नवरत्न के बाद  सर्वश्रेष्ठ कवि कहा है।  

रीतिकाल के महान कवि सेनापति ऋतु वर्णन के लिये प्रसिद्ध हैं.  इन छंदों में श्लेष  नहीं है। वे श्लेष का प्रयोग भाषिक चमत्कार की सृष्टि भले ही करते रहे हों, लेकिन उनका कृत्रिम प्रयोग सृजनात्मक अभिव्यक्ति के सहज प्रवाह को भंग भी करता है।

श्लेष से अधिक सेनापति अपने कवित्तों की बंदिश में कमाल करते हैं और उसके सहारे ही वह पूरे वातावरण की सृष्टि कर डालते हैं। जैसे कि ग्रीष्म ऋतु वर्णन का यह छंद देखिए-

वृष कौं तरनि सहसौ किरन करि, ज्वालन के जाल बिकराल बरसत है।
तचत धरनि, जग जरत झरनि, सीरी छाँह कौं पकरि पंथी-पंछी बिरमत है।

उक्त छंद में लघु और दीर्घ ध्वनियों का ऐसा क्रम बन पड़ा है कि ग्रीष्म ऋतु का वातावरण साक्षात व्यक्त होने लगता है। लघु स्वरों में दुपहरी का सन्नाटा सुनाई देता है है तो दीर्घ ध्वनियों में उसकी विकरालता दिखाई देती है।

सेनापति का एक और पद देखें:


 "नाहीं नाहीं करैं थोरी मांगे सब दैन कहें, मंगन कौ देखि पट देत बार-बार हैं।
जिनकौं मिलत भली प्रापति की घटी होति, सदा सब जन मन भाए निराधार हैं।
भोगी ह्वै रहत बिलसत अवनी के मध्य, कन कन जारैं दान पाठ परिवार है।
सेनापति बचन की रचना बिचारौ जामैं, दाता अरु सूम दोऊ कीने इकसार है।"
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(साभार : http://man-ki-baat.blogspot.com/2006/10/blog-post_09.html, सृजन शिल्पी)

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