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रविवार, 27 सितंबर 2015

vakrokti alankar

: अलंकार चर्चा १२ :
अर्थ द्वैत वक्रोक्ति है 


किसी एक के कथन को, दूजा समझे भिन्न 
वक्र उक्ति भिन्नार्थ में, कल्पित लगे अभिन्न 

स्वराघात मूलक अलंकारों में वक्रोक्ति का स्थान महत्वपूर्ण है. किसी काव्य अंश में किसी व्यक्ति द्वारा कही गयी बात में कोई दूसरा व्यक्ति जब मूल से भिन्न अर्थ की कल्पना करता है तब वक्रोक्ति अलंकार होता है. वक्र उक्ति का अर्थ 'मूल से भिन्न' होता है. एक अर्थ में कही गयी बात को जान-बूझकर दूसरे अर्थ में लेने पर वक्रोक्ति अलंकार होता है. 
उदाहरण:

१. रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून
    पानी गए न ऊबरे, मोती मानस चून
इस दोहे में पानी का अर्थ मोती में 'चमक', मनुष्य के संदर्भ में सम्मान, तथा चूने के सन्दर्भ में पानी है.
२.

मूल से भिन्न अर्थ की कल्पना श्लेष या काकु द्वारा होती है. इस आधार पर वक्रोक्ति अलंकार के २ प्रकार श्लेष वक्रोक्ति तथा काकु वक्रोक्ति हैं.

श्लेष वक्रोक्ति: 

श्रोता अर्थ विशेष पर, देता है जब जोर 
वक्ता ले अन्यार्थ को, ग्रहण करे गह डोर 
एक शब्द से अर्थ दो, चिपक न छोड़ें हाथ  
वहीं श्लेष वक्रोक्ति हो, दो अर्थों के साथ  

रचें श्लेष वक्रोक्ति कवि, जिनकी कलम समर्थ 
वक्ता-श्रोता हँस करें, भिन्न शब्द के अर्थ 
एक शब्द के अर्थ दो, करे श्लेष वक्रोक्ति 
श्रोता-वक्ता सजग हों, मत समझें अन्योक्ति 
  

जिस काव्यांश में एक से अधिक अर्थवाले शब्द का प्रयोग कर वक्ता का अर्थ एक अर्थ विशेष पर होता है किन्तु श्रोता या पाठक का किसी दूसरे अर्थ पर, वहाँ श्लेष वक्रोक्ति अलंकार होता है. जहाँ पर एक से अधिक अर्थवाले शब्द का प्रयोग होने पर वक्ता का एक अर्थ पर बल रहता है किन्तु श्रोता का दूसरे अर्थ पर, वहाँ श्लेष वक्रोक्ति अलंकार होता है. इसका प्रयोग केवल समर्थ कवि कर पाता है चूँकि विपुल शब्द भंडार, उर्वर कल्पना शक्ति तथा छंद नैपुण्य अपरिहार्य होता है.

उदाहरण: 

१. हैं री लाल तेरे?, सखी! ऐसी निधि पाई कहाँ?
               हैं री खगयान? कह्यौं हौं तो नहीं पाले हैं?
   हैं री गिरिधारी? व्है हैं रामदल माँहिं कहुँ?
                  हैं री घनश्याम? कहूँ सीत सरसाले हैं?
   हैं री सखी कृष्णचंद्र? चंद्र कहूँ कृष्ण होत?
                   तब हँसि राधे कही मोर पच्छवारे हैं?
   श्याम को दुराय चन्द्रावलि बहराय बोली 
                   मोरे कैसे आइहैं जो तेरे पच्छवारे हैं? 

२. पौंरि में आपु खरे हरी हैं, बस है न कछू हरि हैं तो हरैवे 
    वे सुनौ कीबे को है विनती, सुनो हैं बिनती तीय कोऊ बरैबे 
    दीबे को ल्याये हैं माल तुम्हें, रगुनाथ ले आये हैं माल लरैबे 
    छोड़िए मान वे पा पकरैं, कहैं, पाप करैं कहैं अबस करैबे 

   इस उदाहरण में 'हरि' के दो अर्थ 'कृष्ण' और 'हारेंगे', विनती के दो अर्थ 'प्रार्थना'  और 'बिना स्त्री के', 'माल' के दो अर्थ 'माला' तथा 'सामान' तथा 'पाप करै' के दो अर्थ 'पैर पकड़ें' तथा 'कुकर्म करें हैं.   

३. कैकेयी सी कोप भवन में, जाने कब से पड़ी हुई है 
   दशरथ आये नहीं मनाने, फाँस ह्रदय में गड़ी हुई है   -चंद्रसेन विराट, ओ गीत के गरुड़, ३२ 

   यहाँ कैकेयी के दो अर्थ 'रानी' तथा 'जनता' और दशरथ के दो अर्थ 'राजा' तथा 'शासक' हैं. 

काकु वक्रोक्ति:

जब विशेष ध्वनि कंठ की, ध्वनित करे अन्यार्थ 
तभी काकु वक्रोक्ति हो, लिखते समझ समर्थ 

'सलिल' काकु वक्रोक्ति में, ध्वनित अर्थ कुछ अन्य 
व्यक्त कंठ की खास ध्वनि, करती- समझें धन्य  

किसी काव्य पंक्ति में कंठ से उच्चरित विशेष ध्वनि के कारण शब्द का मूल से भिन्न दूसरा अर्थ ध्वनित हो तो वहाँ काकु वक्रोक्ति अलंकार होता है. 

उदाहरण:

 १. भरत भूप सियराम लषन बन, सुनि सानंद सहौंगौ 
    पर-परिजन अवलोकि मातु, सब सुख संतोष लहौंगौ 

    इस उदाहरण में भरतभूप, सानंद तथा संतोष शब्दों का उच्चारण काकु युक्त होने से विपरीत अर्थ ध्वनित होता है. 

२. बातन लगाइ सखान सों न्यारो कै, आजु गह्यौ बृषभान किशोरी 
    केसरि सों तन मंजन कै दियो अंजन आँखिन में बरजोरी 
    हे रघुनाथ कहा कहौं कौतुक, प्यारे गोपालै बनाइ  कै गोरी 
    छोड़ि दियो इतनो कहि कै, बहुरो फिरि आइयो  खेलेन होरी 

    यहाँ 'बहुरो फिरि आइयो' में काकु ध्वनि होने से व्यंग्यार्थ है कि 'अब कभी नहीं आओगे'. 

३. कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं?, गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं
    अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, ये कमल के फूल मुरझाने लगे हैं 

    दुष्यंत कुमार की इस ग़ज़ल में 'मंज़र', 'गाते', ''चिल्लाने', 'तालाब', 'पानी', 'फूल', तथा 'कुम्हलाने' शब्दों में काकु ध्वनि से उत्पन्न व्यंग्यार्थ ने आपातकाल में सेंसरशिप के बावजूद कवि का शासन परिवर्तन का सन्देश लोगों को दिया.  

     

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