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रविवार, 18 अक्तूबर 2015

नवगीत:

एक रचना: मेरी आतुर आँखों में हैं * मेरी आतुर आँखों में हैं सपना मैं भी लौटा पाऊँ कभी कहीं तो एक इनाम। * पहला सुख सूचना मिलेगी कोई मुझे सराह रहा. मुझे पुरस्कृत करना कोई इस दुनिया में चाह रहा. अपने करते रहे तिरस्कृत सदा छिपाया कड़वा सच- समाचार छपवा सुख पाऊँ खुद से खुद कह वाह रहा. मेरी आतुर आँखों में हैं नपना, छपता अख़बारों में मैं भी देख सकूँ निज नाम। * दूजा सुख मैं लेने जाऊँ पुरस्कार, फूले छाती. महसूसूं बिन-दूल्हा-घोड़ा मैं बन पाया बाराती. फोटू खिंचे-छपे, चर्चा हो बिके किताब हजारों में भाषण - इंटरव्यू से गर्वित हों मेरे पोते-नाती। मेरी आतुर आँखों में हैं समारोह करतल ध्वनि सभागार की दिलकश शाम। * तीजा सुख मैं दोष किसी को दे, सिर ऊँचा कर पाऊँ. अपनी करनी रहूँ छिपाये दोष अन्य के गिनवाऊँ. चुनती जिसे करोड़ों जनता मैं उसको ही कोसूँगा- अहा! विधाता सारी गड़बड़ मैं उसके सर थोपूँगा. मेरी आतुर आँखों में हैं गर्वित निज छवि, देखूँ उसका मिटता नाम। *

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