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शनिवार, 31 अक्तूबर 2015

मुक्तक

मुक्तक:












*
चाँद हो साथ में चाँदनी रात हो
चुप अधर, नैन की नैन से बात हो 
पानी-पानी हुई प्यास पल में 'सलिल'
प्यार को प्यार की प्यार सौगात हो 
*
चाँद को जोड़कर कर मनाती रही
है हक़ीक़त सजन को बुलाती रही 
पी रही है 'सलिल' हाथ से किन्तु वह 
प्यास अपलक नयन की बुझाती रही 
*
चाँद भी शरमा रहा चाँदनी के सामने
झुक गया है सिर हमारा सादगी के सामने
दूर रहते किस तरह?, बस में में न था सच मान लो 
आ गया है जल पिलाने ज़िन्दगी के सामने 
*
गगन का चाँद बदली में मुझे जब भी नज़र आता
न दीखता चाँद चेहरा ही तेरा तब भी नज़र आता 
कभी खुशबू, कभी संगीत, धड़कन में कभी मिलते-
बसे हो प्राण में, मन में यही अब भी नज़र आता 
*

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