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शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2015

devi geet

लोक सलिला- 
देवीगीत 
- प्रतिभा सक्सेना.




















*
मइया पधारी मोरे अँगना,
मलिनिया फूल लै के आवा,
*
ऊँचे पहारन से उतरी हैं मैया,
छायो उजास जइस चढ़त जुन्हैया.
रचि-रचि के आँवा पकाये ,
कुम्हरिया ,दीप लै के आवा.
*
सुन के पुकार मइया मैया जाँचन को आई ,
खड़ी दुआरे ,खोल कुंडी रे माई !
वो तो आय हिरदै में झाँके ,
घरनिया प्रीत लै के आवा ,
*
दीपक कुम्हरिया ,फुलवा मलिनिया ,
चुनरी जुलाहिन की,भोजन किसनिया.
मैं तो पर घर आई -
दुल्हनियाँ के मन पछतावा.
*
उज्जर हिया में समाय रही जोती .
रेती की करकन से ,निपजे रे मोती.
काहे का सोच बावरिया,
मगन मन-सीप लै के आवा !
*

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