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गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

geet

एक रचना:
*
मुर्दा मन ही
मुर्दा तन की
करे नुमाइश।
*
संबंधों के अनुबंधों को
प्रतिबंधों सम जिसने जाना।
माया-मोह, लोभ-लालच ही
साध्य जिसे, अपना बेगाना। 
नहीं निधन पर 
अश्रु बहाने की भी 
वहाँ रही गुंजाइश।
मुर्दा मन ही
मुर्दा तन की
करे नुमाइश।
*
जानेवाला चला गया पर
बेगाना तो डटा खड़ा है।
चित्र खिंचाने का लालच भी
तनिक न छोटा बहुत बड़ा है। 
साक्ष्य जुटा लूँ,  
काम वक़्त पर आये  
है इतनी फरमाइश।
मुर्दा मन ही
मुर्दा तन की
करे नुमाइश।
*
माटी का ही गढ़ा घरौंदा
माटी ने माटी से मिलकर।
माटी के कुछ बना खिलौने
विदा हुआ माटी में मिलकर। 
हाय विधाता!
सबक न सीखी  
अब भी रंजिश।
मुर्दा मन ही
मुर्दा तन की
करे नुमाइश।
*

 

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