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मंगलवार, 20 अक्तूबर 2015

laghukatha

आलेख :
लघुकथा : एक परिचय
संजीव वर्मा 'सलिल' 
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हिंदी साहित्य की लोकप्रिय विधा है. हिंदी साहित्य की अन्य विधाओं की तरह लघुकथा का मूल भी संस्कृत साहित्य में हैं जहाँ बोध कथा, दृष्टान्त कथा, उपदेश कथा के रूप में वैदिक-पौराणिक-औपनिषदिक काल में इसका उपयोग एक अथवा अनेक व्यक्तियों के मानस को दिशा देने के लिये सफलतापूर्वक किया गया. हितोपदेश तथा पंचतंत्र की कहानियाँ, बौद्ध साहित्य की जातक कथाएँ आधुनिक लघुकथा का पूर्व रूप कही जा सकती हैं. लोक आश्रित्य में लघुकथा का अनगढ़ रूप मिलता है. भारतीय पर्वों में महिलाएँ पूजन अथवा व्रत का समापन करते हुए बहुधा कहानियाँ कहतीं है जिनमें लोक हितैषी सन्देश अन्तर्निहित होता है. साहित्यिक दृष्टि से लघुकथा न होते हुए भी ये आमजन के नज़रिये से कम शब्दों में बड़ा सन्देश देने के कारण लघुकथा के निकट कही जा सकती हैं.
आधुनिक लघु कथा:
हिंदी के आधुनिक साहित्य ने लघुकथा को पश्चिम से ग्रहण किया है. आधुनिक लघुकथा में किसी अनुभव अथवा घटना से उपजी टीस और कचोट को गहराई से अनावृत्त अथवा उद्घाटित किया जाता है. पारिस्थितिक वैषम्य, विडम्बना और विसंगति वर्त्तमान लघुकथा को मर्मवेधी बनाती है. लघुकथा में संक्षिप्तता, सरलता तथा मारकता अपरिहार्य है. लघुकथा हास्य नहीं व्यंग्य को पोषित करती है. अभिव्यंजना में प्रतीक और सटीक बिम्बात्मकता लघुकथा को प्रभावी बनाती है.
लघुकथा का इष्ट नकारात्मक आलोचना मात्र नहीं होता, वह सकारात्मक उद्वेलन से यथार्थ का विवेचनकर परोक्ष मार्गदर्शन करती है. विसंगति को इंगित करने का उद्देश्य बिना उपदेश दिए पाठक के अंतर्मन में विसंगति से मुक्त होने का मनोभाव उत्पन्न करना होता है. यहीं लघुकथा उपदेश कथा, बोध कथा अथवा दृष्टान्त कथा से अलग है.
लघुकथा की भाषा सहज-सरल किन्तु ताना-बाना गसा हुआ होना आवश्यक है. एक भी अनावश्यक शब्द लघुकथा के कथ्य को कमजोर बना देता है. लघुकथा जीवन के अल्प कालखंड का अप्रगटित सत्यांश सामने लाती है. लघुकथा की कसौटी लघुता, तीक्ष्णता, लाक्षणिकता, प्रतीकात्मकता, कलात्मकता, गहनता, तेवर तथा व्यंजना है. लघुकथा मनोरंजन नहीं मनोमंथन के लिये लिखी जाती है. लघुकथा रुचिपूर्ण हो सकती है, रोचक नहीं।
वर्त्तमान लघुकथा का कथ्य वर्णनात्मक, संवादात्मक, व्यंग्यात्मक, व्याख्यात्मक, विश्लेषणात्मक, संस्मरणात्मक हो सकता है किन्तु उसका लघ्वाकरी और मारक होना आवश्यक है. लघुकथा यथार्थ से जुड़कर चिंतन को धार देती है. लघुकथा प्रखर संवेदना की कथात्मक और कलात्मक अभिव्यक्ति है. लघुकथा यथार्थ के सामान्य-कटु, श्लील-अश्लील, छिपे-नग्न, दारुण-निर्मम किसी रूप से परहेज नहीं करती।
लघुकथा में विषयवस्तु से अधिक महत्त्व प्रस्तुति का होता है. विषयवस्तु पहले से उपस्थित और पाठक को विदित होने पर भी उसकी प्रस्तुति ही पाठक को उद्वेलित करती है. प्रस्तुति को विशिष्ट बनती है लघुकथाकार की शैली और कथ्य का शिल्प। लघुकथा की रचना में शीर्षक भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है. शीर्षक ही पाठक के मन में कौतूहल उत्पन्न करता है. शिल्प को प्लेटो ने संरचना, कथ्य और कार्य के चरित का योग (total of structure, meaning and character of the work as a whole) कहा है. लघुकथा विसंगति को पहचानती-इंगित करती है, उसका उपचार नहीं करती। कहानी के आवश्यक तत्व कथोपकथन, चरित्रचित्रण, पृष्भूमि, संवाद आदि लघुकथा में नहीं होते।
हिंदी की लघुकथा में अंग्रेजी की 'शॉर्ट स्टोरी' और 'सैटायर' के तत्व देखे जा सकते हैं किन्तु उसे 'कहानी का सार तत्व' नहीं कहा जा सकता। लघुकथा एक प्रयोगधर्मी विधा है किन्तु असामाजिक अनुभवों की अभिव्यक्ति का साधन नहीं। लघुकथा किसी के उपहास का माध्यम भी नहीं है.
सशक्त लघुकथा अधिक शब्दों की नहीं, बात को सामने रखने के सही तरीके की माँग करती है.
आनंद लें कुछ अच्छी लघुकथाओं का-
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1. काजी का घर -सआदत हसन मंटो 
एक गरीब भूखा काजी के घर गया, कहने लगा: 'मैं भूखा हूँ, मुझे कुछ दो तो मैं खाऊँ।'
काजी ने कहा: 'यह काजी का घर है, कसम खा और चला जा.'
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2. सहानुभूति 
खलील जिब्रान 
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शहर भर की नालियां और मैला साफ़ करने वाले आदमी को देख दार्शनिक महोदय ठहर गए.
"बहुत कठिन काम है तुम्हारा ! यूँ गंदगी साफ़ करना. कितना मुश्किल होता होगा ! दुःख है मुझे ! मेरी सहानुभूति स्वीकारो. " दार्शनिक ने सहानुभूति जताते हुए कहा.
"शुक्रिया हुज़ूर !" मेहतर ने जवाब दिया.
"वैसे आप क्या करते हैं ?" उसने दार्शनिक से पूछा.
" मैं ? मैं लोगों के मस्तिष्क पढ़ता हूँ ! उन के कृत्यों को देखता हूँ ! उन की इच्छाओं को देखता हूँ ! विचार करता हूँ ! " दार्शनिक ने गर्व से जवाब दिया.
"ओह ! मेरी सहानुभूति स्वीकारें जनाब !" मेहतर का जवाब आया.
[खलील जिब्रान की 'सैंड एंड फ़ोम' से]
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3. खुशामद -भारतेंदु हरिश्चन्द्र 
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एक नामुराद आशिक से किसी ने पूछा, 'कहो जी, तुम्हारी माशूका तुम्हें क्यों नहीं मिली।'
बेचारा उदास होकर बोला, 'यार कुछ न पूछो! मैंने इतनी खुशामद की कि उसने अपने को सचमुच ही परी समझ लिया और हम आदमियों से बोलने में भी परहेज किया।'
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4. मुँह तोड़ जवाब - भारतेन्दु हरिश्चंद्र
एक ने कहा: ' न जाने इस लड़के में इतनी बुरी आदतें कहाँ से आयीं? हमें यकीन है इसने कोई बुरी बात हमसे नहीं सीखी।'
लड़का झट से बोल उठा: 'बहुत ठीक है क्योंकि हमने आपसे बुरी आदतें पाई होतीं तो आपमें बहुत सी कम हो जातीं।'
लघुकथा:
5. एकलव्य - संजीव वर्मा 'सलिल'
- 'नानाजी! एकलव्य महान धनुर्धर था?'
- 'हाँ; इसमें कोई संदेह नहीं है.'
- उसने व्यर्थ ही भोंकते कुत्तों का मुंह तीरों से बंद कर दिया था ?' 
-हाँ बेटा.' 
- दूरदर्शन और सभाओं में नेताओं और संतों के वाग्विलास से ऊबे पोते ने कहा - 'काश वह आज भी होता.'
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३. तोता-मैना - प्रज्ञा पाठक
तोता और मैना प्रेम-वार्ता में तल्लीन थे. मैना मान भरे स्वर में बोली: 'शादी के बाद मुझे बड़ा सा घर बनवा दोगे ना?'
तोते ने मनुहार के स्वर में कहा: 'प्रिये! हम छोटे से घर को अपने असीम प्रेम से बड़ा बना देंगे।'
यह सुनते ही मैना फुर्र से उड़कर दूसरे तोते की बगल में जा बैठी।
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