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सोमवार, 12 अक्तूबर 2015

malopama alankar

अलंकार सलिला 

: २०  : मालोपमा अलंकार

























काव्यांश में जब मिले, एकाधिक उपमान  
'सलिल' वहीं मालोपमा, अलंकार पहचान  
*
किसी काव्य एक उपमेय के लिए एक से अधिक से अधिक उपमान दर्शित हों तो वहाँ मालोपमा अलंकार होता है.  

उदाहरण:

१.  नील सरोरुह, नील मनि, नील नीरधर स्याम 

२. कान्ह जिमि कंस पर, तेज तम अंस पर 
    तिमि आरी-वंस पर सेर शिवराज हैं 

३. तम सा नीरव, नभ सा विस्तृत 
    वह सूनापन ही उनका, यह सुख-दुखमय स्पंदन मेरे हों 

४. मुख है सुंदर चंद्र सो, कोमल कमल समान 

५. द्विरद-दन्तों से उठ सुन्दर, 
              सुखद कर-सीकर से बढ़कर 
    भूति से शोभित बिखर-बिखर 
              फ़ैल फिर कटि के से परिकर 
    बदल यों विविध वेश जलधर 
             बनाते थे गिरि को गजधर 

६. सुरसरि अमल सी, शतदल कमल सी 
    रजत धार जैसी, बही जा रही है.
    ये रतनार लाली, घटा श्याम-काली 
    घुलकर लहर में, ढली जा रही है 

७. ममता की गागर जैसी हो,
    करुणा की सागर जैसी हो,
    दुष्टों खातिर काल सरीखी-
    भक्तों को मैया जैसी हो 

८. घोर गरजते मेघ सदृश गरजें बंदूकें  
    बिना रुके बारिश जैसी बरसें बंदूकें 
    नहा लहू में अरिदल की दहलातीं छाती 
    मार शत्रु को, जोगिन सी हर्षें बंदूकें। 

९.  भोर की लालिमा सी है बेटी अहो 
     माँ के वरदान जैसी है पावन कहो 
     बोझ के जैसे इसको न माने कोई 
     है ये अरमान जैसी न फिर क्यों चहो?

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