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मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

upma alankar

: अलंकार चर्चा १८ :



















उपमा अलंकार * जब दो शब्दों में मिले, गुण या धर्म समान. 'उपमा' इंगित कर उसे, बन जाता रस-खान.. जो वर्णन का विषय हो, जिसको कहें सच जान. 'सलिल' वही 'उपमेय' है, निसंदेह लें मान.. जिसके सदृश बता रहे, वह प्रसिद्ध 'उपमान' जोड़े 'वाचक शब्द' औ', 'धर्म' हुआ गुण-गान.. 'उपमा' होता 'पूर्ण' जब, दिखते चारों अंग. होता वह 'लुप्तोपमा', जब न दिखे जो अंग.. आरोपित 'उपमेय' में होता जब 'उपमान'. 'वाचक शब्द' न 'धर्म' हो, तब 'रूपक' अनुमान.. साम्य सेतु उपमा रचे, गुण बनता आधार. साम्य बिना दुष्कर 'सलिल', जीवन का व्यापार.. उपमा इकटक हेरता, टेर रहा उपमान. न्यून नहीं हूँ किसी से, मैं भी तो श्रीमान.. इस गुहार की अनसुनी न कर हम उपमा से ही साक्षात् करते हैं. जब किन्हीं दो भिन्न व्यक्तियों या वस्तुओं में किसी गुण या वृत्ति के आधार पर समानता स्थापित होती है तो वहाँ उपमा अलंकार होता है. उपमा के ४ अंग होते हैं. १. उपमेय: वर्णन का विषय या जिसके सम्बन्ध में बात की जाए या जिसे किसी अन्य के समान बताया जाए वह 'उपमेय' है. 2. उपमान: उपमेय की समानता जिस वस्तु से की जाए या उपमेय को जिसके समान बताया जाये वह उपमान होता है. ३. वाचक शब्द: उपमेय और उपमान के बीच जिस शब्द के द्वारा समानता बताई जाती है, उसे वाचक शब्द कहते हैं. ४. साधारण धर्म: उपमेय और उपमान दोनों में पाया जानेवाला गुण जो समानता का कारक हो, उसे साधारण धर्म कहते हैं. उदाहरण: शब्द बचे रहें जो चिड़ियों की तरह कभी पकड़ में नहीं आते - मंगेश डबराल, साहित्य शिल्पी में इस छंदमुक्त कविता में 'शब्द' उपमेय, 'चिडियों' उपमान, 'तरह' वाचक शब्द तथा 'पकड़ में नहीं आते' साधारण धर्म है. उपमा अलंकार के प्रकार: उपमा के उक्त चारों अंग कभी स्पष्ट दिखते हैं, कभी अदृश्य रहते हैं. १. पूर्णोपमा- जहाँ उपमेय, उपमान, वाचक शब्द व साधारण धर्म इन चारों अंगों का उल्लेख हो. उदाहरण: १. सागर सा गंभीर ह्रदय हो, गिरि सा ऊँचा हो जिसका मन ध्रुव सा जिसका अटल लक्ष्य हो, दिनकर सा हो नियमित जीवन उपमेय- ह्रदय, मन,लक्ष्य, जीवन उपमान- सागर, गिरि, ध्रुव, दिनकर साधारण धर्म- गंभीर, ऊँचा, अटल, नियमित वाचक शब्द- सा २. घिर रहे थे घुँघराले बाल, अंस अवलंबित मुख के पास नीलघन शावक से सुकुमार, सुधा भरने को विधु के पास उपमेय- घुँघराले बाल उपमान- नीलघन शावक साधारण धर्म- सुकुमार वाचक शब्द- से २. लुप्तोपमा- जहाँ उक्त चार अंगों में से किसी या किन्हीं का उल्लेख न हो अर्थात वह लुप्त हो तो वहाँ 'लुप्तोपमा अलंकार' होता है. लुप्तोपमा के ४ भेद: उक्त में से जो अंग लुप्त होता है उसके नाम सहित लुप्तोपमा को पहचाना जाता है. (१) उपमेय लुप्तोपमा: जब उपमेय का उल्लेख न हो, यथा: पड़ी थी बिजली सी विकराल, घन जैसे बाल कौन छेड़े ये काले साँप?, अवधपति उठे अचानक काँप (२) उपमान लुप्तोपमा: जब उपमान का उल्लेख न हो, यथा: तीन लोक झाँकी ऐसी दूसरी न बाँकी जैसी झाँकी झाँकी बाँकी जुगलकिशोर की (३) धर्म लुप्तोपमा: जब धर्म का उल्लेख न हो यथा: प्रति दिन जिसको मैं अंक में साथ ले के निज सकल कुअंकों की क्रिया कीलती की अतिप्रिय जिसका है वस्त्र पीला निराला वह किसलय के अंग वाला कहाँ है? (४) वाचक लुप्तोपमा: जब वाचक शब्द का उल्लेख न हो, यथा: नील सरोरुह श्याम, तरुन अरुन वारिज नयन करहु सो मम उर धाम, सदा क्षीर सागर सयन यथा: १. 'माँगते हैं मत भिखारी के समान' - यहाँ भिखारी उपमान, समान वाचक शब्द, माँगना साधारण धर्म हैं किन्तु मत कौन माँगता है, इसका उल्लेख नहीं है. अतः, उपमेय न होने से यहाँ उपमेय लुप्तोपमा है. २. 'भारत सा निर्वाचन कहीं नहीं है'- उपमेय 'भारत', वाचक शब्द 'सा', साधारण धर्म 'निर्वाचन' है किन्तु भारत की तुलना किस से की जा रही है?, यह उल्लेख न होने से यहाँ उपमान लुप्तोपमा है. ३. 'जनता को अफसर खटमल सा'- यहाँ अफसर उपमेय, खटमल उपमान, सा वाचक शब्द है किन्तु खून चूसने के गुण का उल्लेख नहीं है. अतः, धर्म लुप्तोपमा है. ४. 'नव शासन छवि स्वच्छ गगन'- उपमेय नव शासन, उपमान गगन, साधारण धर्म स्वच्छ है किन्तु वाचक शब्द न होने से 'वाचक लुप्तोपमा' है. *********** उदाहरण : १. और किसी दुर्जय बैरी से, लेना हो तुमको प्रतिशोध तो आज्ञा दो, उसे जला दे दावानल सा मेरा क्रोध - मैथिलीशरण गुप्त, पंचवटी २. यहीं कहीं पर बिखर गयी वह, भग्न विजय माला सी. उनके फूल यहाँ संचित हैं, यह स्मृति शाला सी. ३. सुनि सुरसरि सम पावन बानी. - तुलसीदास, रामचरित मानस ४. अति रमणीय मूर्ति राधा की. ५. नव उज्जवल जल-धार हार हीरक सी सोहित. ६. भोगी कुसुमायुध योगी सा बना दृष्टिगत होता है.- मैथिलीशरण गुप्त, पंचवटी ७. नव अम्बुज अम्बर छवि नीकी. - तुलसीदास, रामचरित मानस ८. मुख मयंक सम मंजु मनोहर. ९. सागर गरजे मस्ताना सा. १०. वह नागिन सी फुफकार गिरी. ११. राधा-वदन चन्द्र सौं सुन्दर. १२. नवल सुन्दर श्याम शरीर की. सजल नीरद सी कल कांति थी. १३. कुंद इंदु सम देह. - तुलसीदास, रामचरित मानस १४. पडी थी बिजली सी विकराल, लपेटे थे घन जैसे बाल. १५. जीते हुए भी मृतक सम रहकर न केवल दिन भरो. १६. मुख बाल रवि सम लाल होकर ज्वाल सा बोधित हुआ. १७. छत्र सा सर पर उठा था प्राणपति का हाथ. १८. लज संकोच विकल भये मीना, विविध कुटुम्बी जिमि धन हीना. १९. सहे वार पर वार अंत तक लड़ी वीर बाला सी. २०.माँ कबीर की साखी जैसी, तुलसी की चौपाई सी. माँ मीरा की पदावली सी माँ है ललित रुबाई सी. माँ धरती के धैर्य सरीखी, माँ ममता की खान है. माँ की उपमा केवल माँ है, माँ सचमुच भगवान है.- जगदीश व्योम, साहित्य शिल्पी में. २१. मंजुल हिमाद्रि का मुकुट शीर्ष राज रहा पद में कमल सा- खिला प्रसन्न लंका है -बृजेश सिंह, आहुति महाकाव्य २२.पूजा की जैसी हर माँ की ममता है माँ की लोरी में मुरली सा जादू है - प्राण शर्मा, साहित्य शिल्पी में २३. रिश्ता दुनियाँ में जैसे व्यापार हो गया - श्यामल सुमन, साहित्य शिल्पी में २४. चहकते हुए पंछियों की सदाएं, ठुमकती हुई हिरणियों की अदाएं! - धीरज आमेटा, साहित्य शिल्पी में ===========================

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