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बुधवार, 11 नवंबर 2015

mahalakshayamashtak stotra

II श्री महालक्ष्यमष्टक स्तोत्र II मूल पाठ-तद्रिन, हिंदी काव्यानुवाद-संजीव 'सलिल' II ॐ II











II श्री महालक्ष्यमष्टक स्तोत्र II नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते I शंख चक्र गदा हस्ते महालक्ष्मी नमोsस्तुते II१II सुरपूजित श्रीपीठ विराजित, नमन महामाया शत-शत. शंख चक्र कर-गदा सुशोभित, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. नमस्ते गरुड़ारूढ़े कोलासुर भयंकरी I सर्व पापहरे देवी महालक्ष्मी नमोsस्तुते II२II कोलाsसुरमर्दिनी भवानी, गरुड़ासीना नम्र नमन. सरे पाप-ताप की हर्ता, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्ट भयंकरी I सर्व दु:ख हरे देवी महालक्ष्मी नमोsस्तुते II३II सर्वज्ञा वरदायिनी मैया, अरि-दुष्टों को भयकारी. सब दुःखहरनेवाली, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. सिद्धि-बुद्धिप्रदे देवी भुक्ति-मुक्ति प्रदायनी I मन्त्रमूर्ते सदा देवी महालक्ष्मी नमोsस्तुते II४II भुक्ति-मुक्तिदात्री माँ कमला, सिद्धि-बुद्धिदात्री मैया. सदा मन्त्र में मूर्तित हो माँ, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. आद्यांतर हिते देवी आदिशक्ति महेश्वरी I योगजे योगसंभूते महालक्ष्मी नमोsस्तुते II५II हे महेश्वरी! आदिशक्ति हे!, अंतर्मन में बसो सदा. योग्जनित संभूत योग से, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. स्थूल-सूक्ष्म महारौद्रे महाशक्ति महोsदरे I महापापहरे देवी महालक्ष्मी नमोsस्तुते II६II महाशक्ति हे! महोदरा हे!, महारुद्रा सूक्ष्म-स्थूल. महापापहारी श्री देवी, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. पद्मासनस्थिते देवी परब्रम्ह स्वरूपिणी I परमेशीजगन्मातर्महालक्ष्मी नमोsस्तुते II७II कमलासन पर सदा सुशोभित, परमब्रम्ह का रूप शुभे. जगज्जननि परमेशी माता, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. श्वेताम्बरधरे देवी नानालंकारभूषिते I जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोsस्तुते II८II दिव्य विविध आभूषणभूषित, श्वेतवसनधारे मैया. जग में स्थित हे जगमाता!, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. महा लक्ष्यमष्टकस्तोत्रं य: पठेद्भक्तिमान्नर: I सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यंप्राप्नोति सर्वदा II९II जो नर पढ़ते भक्ति-भाव से, महालक्ष्मी का स्तोत्र. पाते सुख धन राज्य सिद्धियाँ, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. एककालं पठेन्नित्यं महापाप विनाशनं I द्विकालं य: पठेन्नित्यं धन-धान्यसमन्वित: II१०II एक समय जो पाठ करें नित, उनके मिटते पाप सकल. पढ़ें दो समय मिले धान्य-धन, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. त्रिकालं य: पठेन्नित्यं महाशत्रु विनाशनं I महालक्ष्मीर्भवैन्नित्यं प्रसन्नावरदाशुभा II११II तीन समय नित अष्टक पढ़िये, महाशत्रुओं का हो नाश. हो प्रसन्न वर देती मैया, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. II तद्रिन्कृत: श्री महालक्ष्यमष्टकस्तोत्रं संपूर्णं II तद्रिंरचित, सलिल-अनुवादित, महालक्ष्मी अष्टक पूर्ण. नित पढ़ श्री समृद्धि यश सुख लें, नमन महालक्ष्मी शत-शत.. ******************************************* आरती क्यों और कैसे? संजीव 'सलिल' * ईश्वर के आव्हान तथा पूजन के पश्चात् भगवान की आरती, नैवेद्य (भोग) समर्पण तथा अंत में विसर्जन किया जाता है। आरती के दौरान कई सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। इन सबका विशेष अर्थ होता है। आरती करने ही नहीं, इसमें सम्मिलित होंने से भी पुण्य मिलता है। देवता की आरती करते समय उन्हें 3बार पुष्प अर्पित करें। आरती का गायन स्पष्ट, शुद्ध तथा उच्च स्वर से किया जाता है। इस मध्य शंख, मृदंग, ढोल, नगाड़े , घड़ियाल, मंजीरे, मटका आदि मंगल वाद्य बजाकर जयकारा लगाया जाना चाहिए। आरती हेतु शुभ पात्र में विषम संख्या (1, 3, 5 या 7) में रुई या कपास से बनी बत्तियां रखकर गाय के दूध से निर्मित शुद्ध घी भरें। दीप-बाती जलाएं। एक थाली या तश्तरी में अक्षत (चांवल) के दाने रखकर उस पर आरती रखें। आरती का जल, चन्दन, रोली, हल्दी तथा पुष्प से पूजन करें। आरती को तीन या पाँच बार घड़ी के काँटों की दिशा में गोलाकार तथा अर्ध गोलाकार घुमाएँ। आरती गायन पूर्ण होने तक यह क्रम जरी रहे। आरती पांच प्रकार से की जाती है। पहली दीपमाला से, दूसरी जल से भरे शंख से, तीसरा धुले हुए वस्त्र से, चौथी आम और पीपल आदि के पत्तों से और पांचवीं साष्टांग अर्थात शरीर के पांचों भाग [मस्तिष्क, दोनों हाथ-पांव] से। आरती पूर्ण होने पर थाली में अक्षत पर कपूर रखकर जलाएं तथा कपूर से आरती करते हुए मन्त्र पढ़ें: कर्पूर गौरं करुणावतारं, संसारसारं भुजगेन्द्रहारं। सदावसन्तं हृदयारवंदे, भवं भवानी सहितं नमामि।। पांच बत्तियों से आरती को पंच प्रदीप या पंचारती कहते हैं। यह शरीर के पंच-प्राणों या पञ्च तत्वों की प्रतीक है। आरती करते हुए भक्त का भाव पंच-प्राणों (पूर्ण चेतना) से ईश्वर को पुकारने का हो। दीप-ज्योति जीवात्मा की प्रतीक है। आरती करते समय ज्योति का बुझना अशुभ, अमंगलसूचक होता है। आरती पूर्ण होने पर घड़ी के काँटों की दिशा में अपने स्थान पट तीन परिक्रमा करते हुए मन्त्र पढ़ें: यानि कानि च पापानि, जन्मान्तर कृतानि च। तानि-तानि प्रदक्ष्यंती, प्रदक्षिणां पदे-पदे।। अब आरती पर से तीन बार जल घुमाकर पृथ्वी पर छोड़ें। आरती प्रभु की प्रतिमा के समीप लेजाकर दाहिने हाथ से प्रभु को आरती दें। अंत में स्वयं आरती लें तथा सभी उपस्थितों को आरती दें। आरती देने-लेने के लिए दीप-ज्योति के निकट कुछ क्षण हथेली रखकर सिर तथा चेहरे पर फिराएं तथा दंडवत प्रणाम करें। सामान्यतः आरती लेते समय थाली में कुछ धन रखा जाता है जिसे पुरोहित या पुजारी ग्रहण करता है। भाव यह हो कि दीप की ऊर्जा हमारी अंतरात्मा को जागृत करे तथा ज्योति के प्रकाश से हमारा चेहरा दमकता रहे। सामग्री का महत्व आरती के दौरान हम न केवल कलश का प्रयोग करते हैं, बल्कि उसमें कई प्रकार की सामग्रियां भी डालते जाते हैं। इन सभी के पीछे न केवल धार्मिक, बल्कि वैज्ञानिक आधार भी हैं। कलश-कलश एक खास आकार का बना होता है। इसके अंदर का स्थान बिल्कुल खाली होता है। कहते हैं कि इस खाली स्थान में शिव बसते हैं। यदि आप आरती के समय कलश का प्रयोग करते हैं, तो इसका अर्थ है कि आप शिव से एकाकार हो रहे हैं। किंवदंतिहै कि समुद्र मंथन के समय विष्णु भगवान ने अमृत कलश धारण किया था। इसलिए कलश में सभी देवताओं का वास माना जाता है। जल-जल से भरा कलश देवताओं का आसन माना जाता है। दरअसल, हम जल को शुद्ध तत्व मानते हैं, जिससे ईश्वर आकृष्ट होते हैं। दीपमालिका कल हर दीपक अमल-विमल यश-कीर्ति धवल दे...... शक्ति-शारदा-लक्ष्मी मैया, 'सलिल' सौख्य-संतोष नवल दें...

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