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गुरुवार, 5 नवंबर 2015

muktika

मुक्तिका:
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ज़िंदगी जीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
होंठ हँस सीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
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क्या कहे? कैसे कहें? किससे कहें? बहरा समय
अश्रु चुप पीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
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तुहिन, ओले, आग, बरखा, ठंड, गर्मी या तुषार
झेलते रीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
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मिल तो अंगूर मीठे, ना मिले खट्टे हुए 
फेंकते तीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
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सत्य से साक्षात् कर ये ज़िंदगी दूभर हुई
राम तज सीते रहे हम पुस्तकों के बीच में
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नहीं अबला, ना बला, सबला लगाते पार हम
पल नहीं बीते रहे हम पुस्तकों के बीच में?
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कर रही कुदरत नहीं क्या आदमी से भी मजाक
'सलिल' हो बहते रहे हम पुस्तकों के बीच में
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