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रविवार, 1 नवंबर 2015

navgeet

एक रचना:
चाकरी
*
कर रहा हूँ
चाकरी चुप, दर्द की.
यही है पहचान
सच्चे मर्द की
.
कंकरों पर चोट कर निष्ठुर समय
तोड़ शंकर बोल माँगे जब अभय
यदि उन्हें मैं मौन रह सहला रहा
कह रहे तुम व्यर्थ मन बहला रहा
गर्मियों को क्या पता
कैसी तपिश
हुआ करती असह
मौसम सर्द की?
कर रहा हूँ
चाकरी चुप, दर्द की.
.
हथौड़ों के कौन छाले देखता
रास्ते की पीर कोई लेखता?
सफलता की बोलकर जय शब्द भी
क्या नहीं खुद को रहा है बेचता?
मलिन होता
है कलश वह
जो नहीं किया करता
फ़िक्र उड़ती गर्द की
कर रहा हूँ
चाकरी चुप, दर्द की.
.
सेज सुमनों की नहीं है ज़िंदगी
शूल की जिसने नहीं की बंदगी
वह करेगा स्वच्छ दुनिया क्या कभी
निकट जा जिसने न देखी गंदगी
गीत रचते वक़्त
सुन भी लो कभी
नींव में दब गयी
पत्ती ज़र्द की
कर रहा हूँ
चाकरी चुप, दर्द की.
***
Sanjiv verma 'Salil', 94251 83244
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.in
facebook: sahitya salila / sanjiv verma 'salil'

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