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गुरुवार, 26 नवंबर 2015

tulyayogita alankar

अलंकार सलिला: ३२ 

तुल्ययोगिता अलंकार


तुल्ययोगिता में क्रिया, या गुण मिले समान 
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जब उपमेयुपमान में, क्रिया साम्य हो मित्र.

तुल्ययोगिता का वहाँ, अंकित हो तब चित्र.

तुल्ययोगिता में क्रिया, या गुण मिले समान.

एक धर्म के हों 'सलिल', उपमेयो- उपमान..

जिन अलंकारों में क्रिया की समानता का चमत्कारपूर्ण वर्णन होता है, वे क्रिया साम्यमूलक अलंकार कहे जाते हैं 
ये पदार्थगत या गम्यौपम्याश्रित अलंकार भी कहे जाते हैं. इस वर्ग का प्रमुख अलंकार तुल्ययोगिता अलंकार है

जहाँ प्रस्तुतों और अप्रस्तुतों या उपमेयों और उपमानों में गुण या क्रिया के आधार पर एक धर्मत्व की स्थापना  

की जाए वहाँ तुल्ययोगिता अलंकार होता है 

जब अनेक प्रस्तुतों या अनेक अप्रस्तुतों को एक ही (सामान्य / कॉमन) धर्म से अन्वित किया जाए तो वहाँ तुल्य 

योगिता अलंकार होता है


उदाहरण:

१. गुरु रघुपति सब मुनि मन माहीं। मुदित भये पुनि-पुनि पुलकाहीं

यहाँ विश्वामित्र जी, राम जी, और मुनियों इस सभी प्रस्तुतों का एक समान धर्म मुदित और पुलकित होना है 

२. सब कर संसय अरु अज्ञानू । मंद महीपन्ह कर अभिमानू

    भृगुपति केरि गरब-गरुआई। सुर-मुनिबरन्ह केरि कदराई 

    सिय कर सोच जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुःख-दावा

    संभु-चाप बड़ बोहित पाई। चढ़े जाइ सब संग बनाई

यहाँ अनेक अप्रस्तुतों (राजाओं, परशुराम, देवतनों, मुनियों, सीता, जनक, रानियों) का एक समान धर्म शिव धनुष रूपी 

जहाज पर चढ़ना है राम ने शिव धनुष भंग किया तो सब यात्री अर्थात भय के कारण (सबका संशय और अज्ञान, 

दुष्ट राजाओं का अहंकार, परशुराम का अहं, देवों  व मुनियों का डर, सीता की चिंता, जनक का पश्चाताप, रानियों 

की दुखाग्नि) नष्ट हो गये

३. चन्दन, चंद, कपूर नव, सित अम्भोज तुषार 
    
    तेरे यश के सामने, लागें मलिन अपार

यहाँ चन्दन, चन्द्रमा, कपूर तथा श्वेत कमल व तुषार इन अप्रस्तुतों (उपमानों) का एक ही धर्म 'मलिन लगना' है

४. विलोक तेरी नव रूप-माधुरी, नहीं किसी को लगती लुभावनी
   
    मयंक-आभा, अरविंद मालिका, हंसावली, हास-प्ररोचना उषा

यहाँ कई अप्रस्तुतों का एक ही धर्म 'लुभवना न लगना' है 

५. कलिंदजा के सुप्रवाह की छटा, विहंग-क्रीड़ा, कलनाद माधुरी

    नहीं बनाती उनको विमुग्ध थीं, अनूपता कुञ्ज-लता-वितान की

६. सरोवरों की सुषमा, सुकंजता सुमेरु की, निर्झर की सुरम्यता

    न थी यथातथ्य उन्हें विमोहती, अनंत-सौंदर्यमयी वनस्थली

७. नाग, साँप, बिच्छू खड़े, जिसे करें मतदान

   वह कुर्सी पा दंश दे, लूटे कर अभिमान

तुल्ययोगिता अलंकार के चार प्रमुख  प्रकार हैं-

अ. प्रस्तुतों या उपमेयों की एकधर्मता:

१. मुख-शशि निरखि चकोर अरु, तनु पानिप लखु मीन

    पद-पंकज देखत भ्रमर, होत नयन रस-लीन

२. रस पी कै सरोजन ऊपर बैठि दुरेफ़ रचैं बहु सौंरन कों

    निज काम की सिद्धि बिचारि बटोही चलै उठि कै चहुं ओरन को

    सब होत सुखी रघुनाथ कहै जग बीच जहाँ तक जोरन को

    यक सूर उदै के भए दुःख होत चोरन और चकोरन को

आ. अप्रस्तुतों या उपमानों में एकधर्मता:

१. जी के चंचल चोर सुनि, पीके मीठे बैन

    फीके शुक-पिक वचन ये, जी के लागत हैं न

२. बलि गई लाल चलि हूजिये निहाल आई हौं लेवाइ कै यतन बहुबंक सों

    बनि आवत देखत ही बानक विशाल बाल जाइ न सराही नेक मेरी मति रंक सों

    अपने करन करतार गुणभरी कहैं रघुनाथ करी ऐसी दूषण के संक सों

    जाकी मुख सुषमा की उपमा से न्यारे भए जड़ता सो कमल कलानिध कलंक सों

इ. गुणों की उत्कृष्टता में प्रस्तुत की एकधर्मिता:

१. शिवि दधीचि के सम सुयस इसी भूर्ज तरु ने लिया

    जड़ भी हो कर के अहो त्वचा दान इसने दिया

यहाँ भूर्ज तरु को शिवि तथा दधीचि जैसे महान व्यक्तियों के समान उत्कृष्ट गुणोंवाला बताया गया है

ई. हितू और अहितू दोनों के साथ व्यवहार में एकधर्मता:

१. राम भाव अभिषेक समै जैसा रहा,

   वन जाते भी समय सौम्य वैसा रहा

   वर्षा हो या ग्रीष्म सिन्धु रहता वही,

   मर्यादा की सदा साक्षिणी है मही

२. कोऊ काटो क्रोध करि, कै सींचो करि नेह

    बढ़त वृक्ष बबूल को, तऊ दुहुन की देह
                                                                             ..... निरंतर 

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1 टिप्पणी:

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