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शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

muktika

मुक्तिका:
रहें साल भर
*
रहें साल भर हँस बाँहों में
एक-दूसरे की चाहों में
*
कोशिश, कशिश, कदम का किस्सा
कह-सुन, लिख-पढ़-गढ़ राहों में
*
बहा पसीना, चाय बेचकर
कुछ की गिनती हो शाहों में
*
संगदिली या तंगदिली ने
कसर न छोड़ी है दाहों में
*
भूख-निवाला जैसे हम-तुम
संग रहें चोटों-फाहों में
*
अमर हुई है 'सलिल' लगावट
ज़ुल्म-जुदाई में, आहों में
*
परवाज़ों ने नाप लिया है
आसमान सुन लो वाहों में
***

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