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सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

लघुकथा

लघुकथा-
चिंता की अवस्था 
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दूरदर्शन पर राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर हो रही थी, बहस विविध राजनैतिक दलों के प्रवक्ता अपने-अपने दृष्टिकोण से सरकार को कटघरे में खड़ा करने में जुटे थे यह भुलाकर कि उनके सत्तासीन रहते समय परिस्थितियाँ नियंत्रण से अधिक बाहर थीं। 

पकड़े गये आतंकवादी को न्यायालय द्वारा मौत की सजा सुनाये जाने पर मानवाधिकार की दुहाई, किसी अंचल में एक हत्या होने पर प्रधानमंत्री से त्यागपत्र की माँग, किसी संस्था में नियुक्त कुलपति का विद्यार्थियों द्वारा अकारण विरोध, आतंवादियों की धमकी के बावजूद सुरक्षा से जुडी जानकारी सबसे पहले बताने के लिये न्यूज़ चैनलों में होड़, देश के एक अंचल के लोगों को दूसरे अंचल में रोजगार मिलने का विरोध और संसद में किसी भी कीमत पर कार्यवाही न होने देने की ज़िद। क्या अब भी चिंता की अवस्था खोजने की आवश्यकता है? 
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