स्तम्भ menu

Drop Down MenusCSS Drop Down MenuPure CSS Dropdown Menu

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

laghukatha

लघुकथा-
उलझी हुई डोर 
*
तुम झाड़ू लेकर क्यों आयी हो? विद्यालय गन्दा है तो रहें दो, तुम क्या कर लगी? इतना बड़ा भवन अकेले तो साफ़ नहीं कर सकतीं न? प्राचार्य की जिम्मेदारी है वह साफ करायें। फिर कचरा भी तुम अकेले ने तो नहीं फैलाया है। 

कचरा तो प्राचार्य अकेले ने भी नहीं फैलाया है, न ही शिक्षकों ने। कचरा सबने थोड़ा-थोड़ा फैलाया है, सब थोड़ा-थोड़ा साफ़ करें तो साफ़ हो जायेगा। मैं पूरा भवन साफ़ नहीं कर सकती पर अपनी कक्षा का एक कोना तो साफ़ कर ही सकती हूँ। झाड़ू इसलिए लायी हूँ कि हम अपनी कमरा साफ़ करेंगे तो देखकर दूसरे भी अपना-अपना कमरा साफ़ करेंगे, धीरे-धीरे पूरा विद्यालय साफ़ रहेगा तो हमें अच्छा लगेगा। उलझी हुई डोर न तो एक साथ सुलझती है, न खींचने से, एक सिरा पकड़ कर कोशिश करें तो धीरे-धीरे सुलझ ही जाती है उलझी हुई डोर
***  

कोई टिप्पणी नहीं: