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मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

एक रचना 
बरगद बब्बा 
*
बरगद बब्बा 
खड़े दिख रहे 
जड़ें न लेकिन 
अब मजबूत 
*
बदलावों की घातक बारिश
संस्कार की माटी बहती। 
जटा न दे पाती मजबूती 
पात गिर रहे, डालें ढहतीं।
बेपेंदी के 
लोटों जैसे 
लुढकें घबरा 
पंछी-पूत 
*
रक्षक मानव छाया पाता 
भक्षक बन फिर काट गिराता 
सिर पर धूप पड़े जब सहनी  
हाय-हाय तब खूब मचाता 
सावन-झूला 
गिल्ली-डंडा 
मोबाइल को 
लगे अछूत 
*
मिटा दिये चौपाल-चौंतरे
भूले पूजा-व्रत-फेरे 
तोता-मैना तोड़ रहे दम
घिरे चतुर्दिक बाँझ अँधेरे 
बरगद बब्बा 
अड़े दिख रहे 
टूटी हिम्मत 
मगर अकूत 
***
१६-२-१६ 
Sanjiv verma 'Salil', 94251 83244
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil' 

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