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गुरुवार, 3 मार्च 2016

बरवै छंद

 
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रसानंद दे छंद नर्मदा १८
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दोहा, 
​सोरठा, रोला,  ​
आल्हा, सार
​,​
 ताटंक,रूपमाला (मदन), चौपाई
​, 
हरिगीतिका,  
उल्लाला
​, 
 ​
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गीतिका
छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए
​ बरवै 
से.

 बरवै (नंदा दोहा) 
बरवै अर्ध सम मात्रिक छंद है जिसके विषम चरण (प्रथम, तृतीय) में बारह तथा सम चरण ( द्वितीय, चतुर्थ) में सात मात्राएँ रखने का विधान है सम चरणों के अन्त में जगण (जभान = लघु गुरु लघु)  या तगण (ताराज = गुरु गुरु लघु) होने से बरवै की मिठास बढ़ जाती है। 

बरवै छंद के प्रणेता अकबर के नवरत्नों में से एक महाकवि अब्दुर्रहीम खानखाना 'रहीम' कहे जाते हैं किंवदन्ती है कि रहीम का कोई सेवक अवकाश लेकर विवाह करने गया वापिस आते समय उसकी विरहाकुल नवोढा पत्नी ने उसके मन में अपनी स्मृति बनाये रखने के लिए दो पंक्तियाँ लिखकर दीं रहीम का साहित्य-प्रेम सर्व विदित था सो सेवक ने वे पंक्तियाँ रहीम को सुनायींसुनते ही रहीम चकित रह गये पंक्तियों में उन्हें ज्ञात छंदों से अलग गति-यति का समायोजन था सेवक को ईनाम देने के बाद रहीम ने पंक्ति पर गौर किया और मात्रा गणना कर उसे 'बरवै' नाम दिया मूल पंक्ति में प्रथम चरण के अंत 'बिरवा' शब्द का प्रयोग होने से रहीम ने इसे बरवै कहा। रहीम के लगभग २२५ तथा तुलसी के ७० बरवै हैं विषम चरण की बारह (भोजपुरी में बरवै) मात्रायें भी बरवै नाम का कारण कही जाती है सम चरण के अंत में गुरु लघु (ताल या नन्द) होने से इसे 'नंदा' और दोहा की तरह दो पंक्ति और चार चरण होने से नंदा दोहा कहा गया। पहले बरवै की मूल पंक्तियाँ इस प्रकार है: 

प्रेम-प्रीति कौ बिरवा, चले लगाइ
   सींचन की सुधि लीज्यौ, मुरझि न जाइ।।  

रहीम ने इस छंद का प्रयोग कर 'बरवै नायिका भेद' नामक ग्रन्थ की रचना की। गोस्वामी तुलसीदास की कृति 'बरवै रामायण में इसी का प्रयोग किया गया है। भारतेंदु हरिश्चंद्र तथा जगन्नाथ प्रसाद 'रत्नाकर' आदि ने भी इसे अपनाया। उस समय बरवै रचना साहित्यिक कुशलता और प्रतिष्ठा का पर्याय था दोहा की ही तरह दो पद, चार चरण तथा लय के लिए विख्यात छंद नंदा दोहा या बरवै लोक काव्य में प्रयुक्त होता रहा है। ( सन्दर्भ: डॉ. सुमन शर्मा, मेकलसुता, अंक ११, पृष्ठ २३२) 

रहीम ने फ़ारसी में भी इस छंद का प्रयोग किया-

मीं गुज़रद ईं दिलरा, बेदिलदार
   इक-इक साअत हमचो, साल हज़ार  

इस दिल पर यूँ बीती, हृदयविहीन!
    पल-पल वर्ष सहस्त्र, हुई मैं दीन     

बरवै को 'ध्रुव' तथा' कुरंग' नाम भी मिले ( छ्न्दाचार्य ओमप्रकाश बरसैंया 'ओंकार', छंद-क्षीरधि' पृष्ठ ८८)

मात्रा बाँट-

बरवै के चरणों की मात्रा बाँट ८+४ तथा ४+३ है। छन्दार्णवकार भिखारीदास के अनुसार-

पहिलहि बारह कल करु, बहरहुँ सत्त
यही बिधि छंद ध्रुवा रचु, उनीस मत्त

पहले बारह मात्रा, बाहर सात
इस विधि छंद ध्रुवा रच, उन्निस मात्र 

उदाहरण-
०१. वाम अंग शिव शोभित, शिवा उदार । 
    SI  SI   II   SII    IS  ISI
    सरद सुवारिद में जनु, तड़ित बिहार ॥ 
    III    ISII  S   II   III   ISI

०२. चंपक हरवा अँग मिलि, अधिक सुहाय।
    जानि परै सिय हियरे, जब कुम्हलाय।।

०३. गरब करहु रघुनन्दन, जनि मन मांह।    
    देखहु अपनी मूरति, सिय की छांह।। -तुलसीदास 

०४. मन-मतंग वश रह जब, बिगड़ न काज
    बिन अंकुश विचलत जब, कुचल समाज।। -ओमप्रकाश बरसैंया 'ओंकार' 

०५. 'सलिल' लगाये चन्दन, भज हरि नाम
    पण्डे ठगें जगत को, नित बेदाम।।

०६. हाय!, हलो!! अभिवादन, तनिक न नेह
    भटक शहर में भूले, अपना गेह।।

०७. पाँव पड़ें अफसर के, भूले बाप 
     रोज पुण्य कह करते, छिपकर पाप।।


शन्नो अग्रवाल -
०८. उथल पुथल करे पेट, न पचे बात
     मंत्री को पचे नोट, बन सौगात

०९. चश्में बदले फिर भी, नहीं सुझात
     मन के चक्षु खोल तो, बनती बात

१०. गरीब के पेट नहीं, मारो लात 
     कम पैसे से बिगड़े, हैं हालात

११. पैसे ठूंसे फिर भी, भरी न जेब
    हर दिन करते मंत्री, नये फरेब

१२. मैं हूँ छोटा सा कण, नश्वर गात
    परम ब्रह्म के आगे, नहीं बिसात

१३. महुए के फूलों का, पा आभास
    कागा उड़-उड़ आये, उनके पास

१४. अकल के खोले पाट, जो थे बंद
     आया तभी समझ में, बरवै छंद

अजित गुप्ता-
१५. बारह मात्रा पहले, फिर लिख सात
     कठिन बहुत है लिख ले, मिलती मात

१६.  कैसे पकडूँ इनको, भागे छात्र
     रचना आवे जिनको, रहते मात्र

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1 टिप्पणी:

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