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मंगलवार, 15 मार्च 2016

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तकनीकी आलेख

हिंदी कंप्यूटरीकरण की समस्याएँ - डॉ. काजल बाजपेयी

सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पिछले कुछ दशकों से शीघ्र गति से विकास हुआ है । सूचना प्रौद्योगिकी मनुष्य को सोचने विचारने और संप्रेषण करने के लिए तकनीकी सहायता उपलब्ध कराती है । सूचना प्रौद्योगिकी के अंतर्गत कंप्यूटर के साथ-साथ माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स और संचार प्रौद्योगिकियाँ भी शामिल है । सूचना प्रौद्योगिकी के विकास का अद्यतन रूप हमें इंटरनेट, मोबाइल, रेडियो, टेलीविजन, टेलीफोन, उपग्रह प्रसारण, कंप्यूटर के रूप में दिखाई देता है । आज यदि देखा जाए तो सूचना प्रौद्योगिकी ने पूरे विश्व को अपने आगोश में ले लिया है ।

यह एक संयोग ही है कि कंप्यूटर का विकास सर्वप्रथम ऐसे देशों में हुआ जिनकी भाषा मुख्यतः अंग्रेजी थी । शायद यही कारण है कि रोमनेतर लिपियों में कंप्यूटर पर कार्य कुछ देरी से आरंभ हुआ । ऐसा कोई तकनीकी कारण नहीं है कि अंग्रेजी कंप्यूटर के लिए आदर्श भाषा समझ ली जाए । कंप्यूटर की दो संकतों की अपनी एक स्वतंत्र गणितीय भाषा है और उसी में वह हमारी भाषाओं को ग्रहण करके अपने समस्त कार्य करता है। कंप्यूटर टेक्नोलॉजी के अंतर्गत प्राकृतिक भाषा संसाधन के क्षेत्र में विश्व भर में अनेक विशेषज्ञ प्रणालियों का विकास किया गया है, जिनके माध्यम से कंप्यूटर साधित भाषा शिक्षण, मशीनी अनुवाद और वाक् संसाधन से संबंधित विभिन्न अनुप्रयोग विकसित किए गए हैं ।

हिंदी कंप्यूटरीकरण हिंदी भाषा से सम्बन्धित सकल कार्यों को कम्प्यूटर, मोबाइल या अन्य डिजिटल युक्तियों पर कर पाने से सम्बन्धित है। यह मुख्यत: उन साफ्टवेयर उपकरणों एवं तकनीकों से सम्बन्ध रखता है जो कम्प्यूटर पर हिंदी के विविध प्रकार से प्रयोग में सुविधा प्रदान करते हैं। आज के युग में हिंदी कंप्यूटरीकरण के साफ्टवेयरों का बहुत ही महत्व है। हिंदी कंप्यूटरीकरण के मुख्य क्षेत्र हैं:

1. भाषा सम्पादित्र
2. हिंदी वर्तनी जांचक
3. फॉण्ट परिवर्तक
4. लिपि परिवर्तक
5. अनुवादक
6. हिंदी टेक्स्ट को वाक् में बदलने का साफ्टवेयर
7. हिंदी में बोली गयी बात को हिंदी पाठ में बदलने वाला साफ्टवेयर
8. देवनागरी का ओसीआर
9. हिंदी के विविध प्रकार के शब्दकोश
10. हिंदी के विश्वकोश
11. हिंदी की ई-पुस्तकें
12. हिंदी में खोज
13. हिंदी में ईमेल

लेकिन आज भी लाख कोशिशों के बावजूद कंप्यूटर पर हिंदी में लिखने वालों की संख्या सीमित है। वैसे तो इसके अनेकों कारण हो सकते हैं लेकिन कुछ कारण जो मुझे गहन रूप से नज़र आते हैं वे हैं-

1. अंग्रेजी भाषा आधारित सिस्टम (द्विभाषिकता का अभाव) – आज के दौर में इंटरनेट पर सभी तरह की महत्वपूर्ण जानकारियाँ व सूचनाएँ उपलब्ध हैं जैसे परीक्षाओं के परिणाम, समाचार, ई-मेल, विभिन्न प्रकार की पत्र-पत्रिकाएँ, साहित्य, अति महत्वपूर्ण जानकारी युक्त डिजिटल पुस्तकालय आदि। परन्तु ये प्राय: सभी अंग्रेज़ी भाषा में हैं। भारतीय परिवेश में अधिकतर लोग अंग्रेज़ी भाषा में निपुण नहीं हैं। अत: कई हिंदी भाषी लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करने में भाषाई कठिनाई महसूस करते हैं और कम्प्यूटर के उपलब्ध होते हुए भी वह कम्प्यूटर व इंटरनेट का उपयोग करने से वंचित रह जाते हैं। यदि इंटरनेट एक्सप्लोरर का संपूर्ण इंटरफेस हिंदी (देवनागरी लिपि) में होने के साथ-साथ इसमें वेबपृष्ठ के अंग्रेज़ी पाठ को माउस क्लिक के माध्यम से हिंदी में अनुवाद करने की सुविधा सहित हो तो अंग्रेज़ी भाषा की बाधा हिंदी भाषी कम्प्यूटर उपयोक्ताओं के काम में बाधा नहीं रहेगी। वेबपृष्ठ पर अनुवाद सुविधा कम्प्यूटर उपयोक्ताओं के लिए इंटरनेट पर उपलब्ध सूचना को उनकी अपनी ही भाषा में समझने में सहायक होगी।

मुझ जैसे करोड़ो हिंदी भाषी कम्प्यूटर उपयोक्ताओं को कम्प्यूटर के उपयोग में कई समस्याएँ सिर्फ अंग्रेज़ी भाषा में अपनी कमजोरी होने की वजह से आती हैं न कि इसकी तकनीकी की वजह से।

आज भी भारत में सॉफ्टवेयर या ऑपरेटिंग सिस्टम में विंडोज अंग्रेजी में ही अपनी जड़े जमाए हुए है। ना तो द्विभाषिक रूप (अंग्रेजी और हिंदी) में ऑपरेटिंग सिस्टम उपलब्ध हैं और ना ही हिंदी में। अब चूंकि भारत में अभी भी बहुसंख्य जनता इंटरनेट के लिए साइबर कैफे पर निर्भर है, इसलिए हिंदी के प्रसार में यह भी एक बड़ी बाधा है। यदि साइबर कैफे में हिंदी का प्रयोग सुलभ हो तो बहुत से लोग हिंदी मे जुड़ेंगे।

2. फॉन्ट की जानकारी का अभाव - आजकल लोगों को फॉन्ट की विवधता के बारे में भी पूरी तरह से ज्ञान प्राप्त नहीं है।

3. हिंदी टाईपिंग की समस्या - आज भी की-बोर्ड अंग्रजी में ही उपलब्ध होते हैं। हिंदी टाईपिंग करने के लिए अंग्रेजी की-बोर्ड पर हिंदी की वर्णमाला चिपका दी जाती है। अब पहले तो वैसे ही आम कंप्यूटर उपयोगकर्ता को यूनिकोड का पता होता नहीं, आज भी हिंदी टाइपिंग के बारे में एक आम कंप्यूटर उपयोक्ता को यही मालूम है कि इसके लिए पहले हिंदी की टाइपिंग (रेमिंगटन) सीखनी होती है। फोनेटिक तथा इनस्क्रिप्ट प्रणालियों के बारे में बहुत ही कम लोगों को पता है।

टाइपिंग के लिए ISM नामक औजार सीडैक ने बनाया है । परंतु ये मुफ्त सॉफ्टवेयर नहीं, इसलिए आम आदमी के बस में इसे खरीदना नहीं है। इसका कोई ट्रायल तक उपलब्ध नहीं जिससे कि कोई इसका परीक्षण कर इसे लेने के बारे में विचार कर सके। इसके अलावा ये केवल कुछ चुनिंदा सॉफ्टवेयरों पर ही काम करता है। इन वजहों से ये उपरोक्त समस्या का समाधान नहीं हो सकता।

फोनेटिक टाइपिंग वालों के लिए एक तरीका है बरहा डायरैक्ट में नॉन-यूनिकोड टाइपिंग द्वारा। बरहा में अयूनिकोडित टाइपिंग के लिए BRH-Devanagari नामक नॉन-यूनिकोड फॉन्ट होता है। परंतु इसमें केवल एक ही फॉन्ट का प्रयोग किया जा सकता है।

एक अन्य टूल है सीडैक का GIST-TT Typing Tool इसमें तीनों लेआउट उपलब्ध हैं – फोनेटिक, इनस्क्रिप्ट तथा रेमिंगटन। यह एक नॉन-यूनिकोड इनपुट मैथड एडीटर है। इसमें चार फॉन्ट उपलब्ध हैं लेकिन वो डीटीपी जैसे कामों के लिए उपयुक्त नहीं।

4. यूनिकोड के बारे में जागरुकता का अभाव - एक आम कंप्यूटर प्रयोगकर्ता को यूनिकोड के बारे में पता ही नहीं कि यह क्या है, इसके क्या फायदे हैं। यदि वह इस बारे जागरुक हो तो वह यूनिकोड समर्थन वाले ऑपरेटिंग सिस्टमों को अपनायेगा। यूनिकोड के आगमन के बाद से बहुत से सॉफ्टवेयरों, साइटों तथा ऑनलाइन सेवाओं का यूनिकोडकरण शुरु हुआ। आज इनमें से अधिकतर यूनिकोड सक्षम हैं लेकिन अब भी अक्सर ऐसा होता है कि हम कोई सॉफ्टवेयर या ऑनलाइन सेवा में हिंदी टाइप करने लगते हैं तो डब्बे या प्रश्नचिन्ह नजर आने लगते हैं अर्थात वह यूनिकोड का समर्थन नहीं करता। अब इनमें से कई जगह तो फिर हिंदी में टाइप करना असंभव ही हो जाता है लेकिन जहाँ पर फॉन्ट बदलने की सुविधा है वहाँ नॉन-यूनिकोड फॉन्ट जैसे कृतिदेव आदि चुनकर हिंदी टाइप की जा सकती है। यद्यपि इससे वह बात नहीं बनती जो यूनिकोड में है, इसमें डाटा-प्रोसैसिंग जैसे सर्चिंग-सॉर्टिंग आदि नहीं की जा सकती।

5. तकनीकी अज्ञान - अधिकतर व्यक्तियों को विंडोज आदि ऑपरेटिंग सिस्टम तक इंस्टाल करना नहीं आता। यदि वे चाहें तो भी कुछ कर नहीं सकते।

6. पुराना हार्डवेयर - सब जगहों पर अक्सर पुराने हार्डवेयर युक्त कंप्यूटर होते हैं जो कि नए ऑपरेटिंग सिस्टमों को चलाने के लिए सक्षम नहीं होते। यह एक प्रमुख कारण है।

आज भारत में जो सॉफ्टवेयर अंग्रेजी में उपलब्ध हैं, यदि वे हिंदी में भी उपलब्ध कराए जाएँ तो उनका सार्थक उपयोग होगा जिससे हिंदी कंप्यूटरीकरण की बेहतर सेवा हो सकेगी।

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डॉ. काजल बाजपेयी, संगणकीय भाषावैज्ञानिक, सी-डैक, पुणे
साभार- साहित्य शिल्पी 

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