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रविवार, 13 मार्च 2016

laghukatha

लघुकथा 
राहत की सांस 
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लेख वार्ता (चैट) पर बार-बार रचनाओं की प्रशंसा के बाद कहाँ रहते हैं, क्या करते हैं? घर में कौन-कौन हैं? कविता कैसे करते हैं? जैसे प्रश्न किये गये। उसने सहज शालीनतापूर्वक उत्तर दे दिए। जब उसे स्वस्थ्य और सुन्दर कहते हुए पूछा गया कि वह एकांत में समय कैसे बिताता है?, उसके शौक क्या है ? तो वह चौंका और कुछ रुखाई के साथ उत्तर दिया कि उससे केवल साहित्य संबंध में चर्चा की जाए, अन्य विषयों में कोई रूचि नहीं है।  वह स्तब्ध रह गया यह देखकर कि विपन्नता, समाज के अत्याचारों से पीड़ित, पुरुषों को कोसने, स्वावलंबन और स्त्री अधिकारों की दुहाई देनेवाली ने अपने निर्वस्त्र चित्र भेजते हुए पूछा कि वह प्रति रात्रि कितनी राशि दे सकता है?  

क्रोध, क्षोभ और अपमान का अनुभव करते हुए उसने फटकार लगायी कि विवाहित और बच्चों की माँ होते हुए उसका यह आचरण कैसे उचित है? यदि अर्थाभाव है तो उसे विधि सम्मत व्यवसाय कर अतिरिक्त धनार्जन करना चाहिए। इस तरह समाज को प्रदूषित करने का उसके बच्चों पर क्या असर होगा? 

​​उत्तर मिला कि संपन्न वर्ग यह सब करता है तो फैशन कहा जाता है, गरीब को सब उपदेश देते हैं, सहायता नहीं करते। देह व्यवसाय को मान्यता देनेवाले देशों के उदाहरण के साथ उस को बुर्जुआ, घिसी-पिटी दकियानूसी घटिया सोचवाला, समाज की प्रगति में बाधक कहते हुए समय के साथ बदलने की सीख दी गयी। स्त्री का अपनी देह पर पूरा अधिकार है। इससे रोकनेवाली पुरुषप्रधान मानसिकता समाप्त कर स्त्री सशक्तिकरण समय की माँग है। 

उसने हार मानते हुए फेसबुक प्रबंधन को रिपोर्ट कर वह लेखा बंद कराकर राहत की सांस ली।
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1 टिप्पणी:

Kanta Roy ने कहा…

एक अजीब क्षण विशेष देखने को मिला यहाँ , बेहद चौकाने वाली मनोवृत्ति को लेखन का उद्देश्य बनाया है आपने . ये कैसी सशक्तिकरण ,ये कैसा समय की मांग है ?
बेहद सार्थक लघुकथा बन पड़ी है ये . बहुत -बहुत बधाई आपको आदरणीय संजीव जी इस उत्कृष्ट सृजन के लिए .