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गुरुवार, 3 मार्च 2016

muktika

मुक्तिका:
*
जब भी होती है हव्वा बेघर 
आदम रोता है मेरे भीतर
*
आरक्षण की फाँस बनी बंदूक
जले घोंसले, मरे विवश तीतर 
*
बगुले तालाबों को दे धाढ़स  
मार रहे मछली घुसकर भीतर 
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नहीं चेतना-चिंतन संसद में 
बजट निचोड़े खूं थोपे जब कर 
*
खुद के हाथ तमाचा गालों पर 
मार रहे जनतंत्र अश्रु से तर 
*
पीड़ा-लाश सियासत का औज़ार 
शांति-कपोतों के कतरें नित पर 
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भक्षक के पहरे पर रक्षक दीन 
तक्षक कुंडली मार बना अफसर 
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