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गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

कुण्डलिनी

​​रसानंद दे छंद नर्मदा २४​​: ​ ६-४-२०१६
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
​दोहा, ​सोरठा, रोला, ​आल्हा, सार​,​ ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई​, ​हरिगीतिका, उल्लाला​,गीतिका,​घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी,​ छप्पय तथा भुजंगप्रयात छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए​ कुण्डलिनी छंद से.

कुण्डलिनी का वृत्त है दोहा-रोला युग्म
*
कुण्डलिनी हिंदी के कालजयी और लोकप्रिय छंदों में अग्रगण्य है एक दोहा (दो पंक्तियाँ, १३-११ पर यति, विषम चरण के आदि में जगण वर्जित, सम चरणान्त गुरु-लघु या लघु- लघु-लघु) तथा एक रोला (चार पंक्तियाँ, ११-१३यति, विषम चरणान्त गुरु-लघु या लघु- लघु-लघु, सम चरण के आदि में जगण वर्जित,सम चरण के अंत में २ गुरु, लघु-लघु-गुरु, या ४ लघु) मिलकर षट्पदिक (छ: पंक्ति) कुण्डलिनी छंद को आकार देते हैं दोहा और रोला की ही तरह कुण्डलिनी भी अर्ध सम मात्रिक छंद है दोहा का अंतिम या चौथा चरण रोला  प्रथम चरण बनाकर दोहराया जाता है दोहा का प्रारंभिक शब्द, शब्द-समूह या शब्दांश रोला का अंतिम शब्द, शब्द-समूह या शब्दांश होता है प्रारंभिक और अंतिम शब्द, शब्द-समूह या शब्दांश की समान आवृत्ति से ऐसा प्रतीत होता है मानो जहाँ से आरम्भ किया वही लौट आये, इस तरह शब्दों के एक वर्तुल या वृत्त की प्रतीति होती है सर्प जब कुंडली मारकर बैठता है तो उसकी पूँछ का सिरा जहाँ होता है वहीं से वह फन उठाकर चतुर्दिक  देखता है   

१. कुण्डलिनी छंद ६ पंक्तियों का छंद है जिसमें एक दोहा और एक रोला छंद  होते हैं
२. दोहा का अंतिम चरण रोला का प्रथम चरण होता है
३. दोहा का आरंभिक शब्द, शब्दांश, शब्द समूह या पूरा चरण रोला के अंत में प्रयुक्त होता है
४. दोहा तथा रोला अर्ध सम मात्रिक  छंदहैं अर्थात इनके आधे-आधे हिस्सों में समान मात्राएँ  होती हैं

अ. दोहा में २ पंक्तियाँ होती हैं, प्रत्येक के २ चरणों में १३+११=२४ मात्राएँ होती हैं. दोनों पंक्तियों में विषम (पहले, तीसरे) चरण में १३ मात्राएँ तथा सम (दूसरे, चौथे) चरण में ११ मात्राएँ होती हैं
आ. दोहा के विषम चरण के आदि में जगण (जभान, लघुगुरुलघु जैसे अनाथ) वर्जित होता है शुभ शब्द जैसे विराट अथवा दो शब्दों में जगण जैसे रमा रमण वर्जित नहीं होते 
इ. दोहा के विषम चरण का अंत रगण (राजभा गुरुलघुगुरु जैसे भारती) या नगण (नसल लघुलघुलघु जैसे सलिल) से होना चाहिए 
ई. दोहा के सम चरण के अंत में गुरुलघु (जैसे ईश) होना आवश्यक है
उ. दोहा के लघु-गुरु मात्राओं की संख्या के आधार पर २३ प्रकार होते हैं
उदाहरण: समय-समय की बात है, समय-समय का फेर
               जहाँ देर है वहीं है, सच मानो अंधेर
 
५.  रोला भी अर्ध सम मात्रिक  छंद है अर्थात इसके आधे-आधे हिस्सों में समान मात्राएँ  होती हैं
क. रोला में  ४ पंक्तियाँ होती हैं, प्रत्येक के २ चरणों में ११+१३=२४ मात्राएँ होती हैं दोनों पंक्तियों में विषम (पहले, तीसरे, पाँचवे, सातवें) चरण में ११  मात्राएँ तथा सम (दूसरे, चौथे, छठवें, आठवें) चरण में १३ मात्राएँ होती हैं
का. रोला के विषम चरण के अंत में गुरुलघु (जैसे ईश) होना आवश्यक है
कि. रोला के सम चरण के आदि में जगण (जभान, लघुगुरुलघु जैसे अनाथ) वर्जित होता है शुभ शब्द जैसे विराट अथवा दो शब्दों में जगण जैसे रमा रमण वर्जित नहीं होते
की. रोला के सम चरण का अंत  रगण (राजभा गुरुलघुगुरु जैसे भारती) या नगण (नसल लघुलघुलघु जैसे सलिल) से होना चाहिए 
उदाहरण: सच मानो अंधेर, मचा संसद में हुल्लड़
 
               हर सांसद को भाँग, पिला दो भर-भर कुल्हड़
               भाँग चढ़े मतभेद, दूर हो करें न संशय
               नाचें गायें झूम, सियासत भूल हर समय
६. कुण्डलिनी:
                      समय-समय की बात है, समय-समय का फेर
                      जहाँ देर है वहीं है, सच मानो अंधेर
                      सच मानो अंधेर, मचा संसद में हुल्लड़
                      हर सांसद को भाँग, पिला दो भर-भर कुल्हड़
                      भाँग चढ़े मतभेद, दूर हो करें न संशय
                      नाचें गायें झूम, सियासत भूल हर समय

कुण्डलिया है जादुई, छन्द श्रेष्ठ श्रीमान
दोहा रोला का मिलन, इसकी है पहिचान
इसकी है पहिचान, मानते साहित सर्जक
आदि-अंत सम-शब्द, साथ बनता ये सार्थक
लल्ला चाहे और, चाहती इसको ललिया
सब का है सिरमौर छन्द, प्यारे, कुण्डलिया  - नवीन चतुर्वेदी 

कुण्डलिया छन्द का विधान उदाहरण सहित

कुण्डलिया है जादुई
२११२ २ २१२ = १३ मात्रा / अंत में लघु गुरु के साथ यति
छन्द श्रेष्ठ श्रीमान
२१ २१ २२१ = ११ मात्रा / अंत में गुरु लघु
दोहा रोला का मिलन
२२ २२ २ १११ = १३ मात्रा / अंत में लघु लघु लघु [प्रभाव लघु गुरु] के साथ यति
इसकी है पहिचान
११२ २ ११२१ = ११ मात्रा / अंत में गुरु लघु
इसकी है पहिचान,
११२ २ ११२१ = ११ मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
मानते साहित सर्जक
२१२ २११ २११ = १३ मात्रा
आदि-अंत सम-शब्द,
२१ २१ ११ २१ = ११ मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
साथ, बनता ये सार्थक
२१ ११२ २ २११ = १३ मात्रा
लल्ला चाहे और
२२ २२ २१ = ११ मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
चाहती इसको ललिया
२१२ ११२ ११२ = १३ मात्रा
सब का है सिरमौर
११ २ २ ११२१ = ११ मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
छन्द प्यारे कुण्डलिया
२१ २२ २११२ = १३ मात्रा

उदाहरण -
०१. भारत मेरी जान है,  इस पर मुझको नाज़      
      नहीं रहा बिल्कुल मगर, यह कल जैसा आज
      यह कल जैसा आज, गुमी सोने की चिड़िया
      बहता था घी-दूध, आज सूखी हर नदिया
      करदी भ्रष्टाचार- तंत्र ने, इसकी दुर्गत      
      पहले जैसा आज,  कहाँ है? मेरा भारत  - राजेंद्र स्वर्णकार 




०२. भारत माता की सुनो, महिमा अपरम्पार ।
      इसके आँचल से बहे, गंग जमुन की धार ।।
      गंग जमुन की धार, अचल नगराज हिमाला ।
      मंदिर मस्जिद संग, खड़े गुरुद्वार शिवाला ।।
      विश्वविजेता जान, सकल जन जन की ताकत ।
      अभिनंदन कर आज, धन्य है अनुपम भारत ।। - महेंद्र वर्मा

०३. भारत के गुण गाइए, मतभेदों को भूल
      फूलों सम मुस्काइये, तज भेदों के शूल
      तज भेदों के, शूल / अनवरत, रहें सृजनरत
      मिलें अँगुलिका, बनें / मुष्टिका, दुश्मन गारत
      तरसें लेनें. जन्म / देवता, विमल विनयरत
      'सलिल' पखारे, पग नित पूजे, माता भारत
      (यहाँ अंतिम पंक्ति में ११ -१३ का विभाजन 'नित' ले मध्य में है अर्थात 'सलिल' पखारे पग नि/त पूजे, माता भारत में यति एक शब्द के मध्य में है यह एक काव्य दोष है और इसे नहीं होना चाहिए। 'सलिल' पखारे चरण करने पर यति और शब्द एक स्थान पर होते हैं, अंतिम चरण 'पूज नित माता भारत' करने से दोष का परिमार्जन होता है।)

०४. कंप्यूटर कलिकाल का, यंत्र बहुत मतिमान
      इसका लोहा मानते, कोटि-कोटि विद्वान
      कोटि-कोटि विद्वान, कहें- मानव किंचित डर
      तुझे बना ले, दास अगर हो, हावी तुझ पर
      जीव श्रेष्ठ, निर्जीव हेय, सच है यह अंतर
      'सलिल' न मानव से बेहतर कोई कंप्यूटर
      ('सलिल' न मानव से बेहतर कोई कंप्यूटर' यहाँ 'बेहतर' पढ़ने पर अंतिम पंक्ति में २४ के स्थान पर २५ मात्राएँ हो रही हैं। उर्दूवाले 'बेहतर' या 'बिहतर' पकर यह दोष दूर हुआ मानते हैं किन्तु हिंदी में इसकी अनुमति नहीं है। यहाँ एक दोष और है, ११ वीं-१२ वीं मात्रा है 'बे' है जिसे विभाजित नहीं किया जा सकता। 'सलिल' न बेहतर मानव से' करने पर अक्षर-विभाजन से बच सकते हैं पर 'मानव' को 'मा' और 'नव' में तोड़ना होगा, यह भी निर्दोष नहीं है। 'मानव से अच्छा न, 'सलिल' कोई कंप्यूटर' करने पर पंक्ति दोषमुक्त होती है।)

०५. सुंदरियाँ घातक 'सलिल', पल में लें दिल जीत
      घायल करें कटाक्ष से, जब बनतीं मन-मीत
      जब बनतीं मन-मीत, मिटे अंतर से अंतर
      बिछुड़ें तो अवढरदानी भी हों प्रलयंकर
      असुर-ससुर तज सुर पर ही रीझें किन्नरियाँ
      नीर-क्षीर बन, जीवन पूर्ण करें सुंदरियाँ    
     (इस कुण्डलिनी की हर पंक्ति में २४ मात्राएँ हैं। इसलिए पढ़ने पर यह निर्दोष प्रतीत हो सकती है। किंतु यति स्थान की शुद्धता के लिये अंतिम ३ पंक्तियों को सुधारना होगा।   
'अवढरदानी बिछुड़ / हो गये थे प्रलयंकर', 'रीझें सुर पर असुर / ससुर तजकर किन्नरियाँ', 'नीर-क्षीर बन करें / पूर्ण जीवन सुंदरियाँ'  करने पर छंद दोष मुक्त हो सकता है।) 

०६. गुन के गाहक सहस नर, बिन गन लहै न कोय
      जैसे कागा-कोकिला, शब्द सुनै सब कोय 
      शब्द सुनै सब कोय, कोकिला सबै सुहावन 
       दोऊ को इक रंग, काग सब लगै अपावन 
       कह 'गिरधर कविराय', सुनो हे ठाकुर! मन के
      बिन गुन लहै न कोय, सहस नर गाहक गुन के। - गिरधर 
      कुण्डलिनी छंद का सर्वाधिक और निपुणता से प्रयोग करनेवाले गिरधर कवि ने यहाँ आरम्भ के अक्षर, शब्द या शब्द समूह का प्रयोग अंत में ज्यों का त्यों न कर, प्रथम चरण के शब्दों को आगे-पीछे कर प्रयोग किया है। ऐसा करने के लिये भाषा और छंद पर अधिकार चाहिए।   

०७. हे माँ! हेमा है कुशल, खाकर थोड़ी चोट 
      बच्ची हुई दिवंगता, थी इलाज में खोट 
      थी इलाज में खोट, यही अच्छे दिन आये
      अभिनेता हैं खास, आम जन हुए पराये
      सहकर पीड़ा-दर्द, जनता करती है क्षमा?
      समझें व्यथा-कथा, आम जन का कुछ हेमा
      यहाँ प्रथम चरण का एक शब्द अंत में है किन्तु वह प्रथम शब्द नहीं है

०८. दल का दलदल ख़त्म कर, चुनिए अच्छे लोग
      जिन्हें न पद का लोभ हो, साध्य न केवल भोग
      साध्य न केवल भोग, लक्ष्य जन सेवा करना
      करें देश-निर्माण, पंथ ही केवल वरना
      कहे 'सलिल' कवि करें, योग्यता को मत ओझल
      आरक्षण कर  ख़त्म, योग्यता ही हो संबल 
      यहाँ आरम्भ के शब्द 'दल' का समतुकांती शब्द 'संबल' अंत में है।  प्रयोग मान्य हो या न हो, विचार करें

०९. हैं ऊँची दूकान में, यदि फीके पकवान।
      जिसे- देख आश्चर्य हो, वह सचमुच नादान।
      वह सचमुच नादान, न फल या छाँह मिलेगी।
      ऊँचा पेड़ खजूर, व्यर्थ- ना दाल गलेगी।
      कहे 'सलिल' कविराय, दूर हो ऊँचाई से।
      ऊँचाई दिख सके, सदा ही नीचाई से
      यहाँ प्रथम शब्द 'है' तथा अंत में प्रयुक्त शब्द 'से' दोनों गुरु हैं। प्रथम दृष्टया भिन्न प्रतीत होने पर भी दोनों के उच्चारण में लगनेवाला समय समान होने से छंद निर्दोष है
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1 टिप्पणी:

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