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रविवार, 22 मई 2016

मुक्तिका

मुक्तिका
*
घुलें-मिल, बनें हम
न मैं-तुम, रहें अब
.
कहो तुम, सुनें हम
मिटें दूरियाँ सब
.
सभी सच, सुनें हम
न कोई नबी-रब
.
बढ़ो तुम, बढ़ें हम
मिलें मंज़िलें तब
.
लिखो तुम, पढ़ें हम
रहें चुप, सुनें जब
.
सिया-सत वरें हम
सियासत अजब ढब
.
बराबर हुए हम
छिना मत, नहीं दब
.
[दस मात्रिक दैशिक छन्द,
मापनी- १२ ११ १२११,
रुक्न- फऊलुन फऊलुन]
१०-५-२०१६, हरदोई

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