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गुरुवार, 26 मई 2016

नवगीत

नवगीत  
*
तन पर 
पहरेदार बिठा दो 
चाहे जितने, 
मन पाखी को 
कैद कर सके 
किसका बूता?
*
तनता-झुकता 
बढ़ता-रुकता 
तन ही हरदम।
हारे ज्ञानी
झुका न पाये 
मन का परचम।
बाखर-छानी 
रोक सकी कब 
पानी चूता? 
मन पाखी को 
कैद कर सके 
किसका बूता?
*
ताना-बाना
बुने कबीरा 
ढाई आखर।
ज्यों की त्यों ही 
धर जाता है 
अपनी चादर।
पैर पटककर 
सना धूल में 
नाहक जूता। 
मन पाखी को 
कैद कर सके 
किसका बूता?
*
चढ़ी शीश पर 
नहीं उतरती 
क़र्ज़ गठरिया।
आस-मदारी
नचा रहा है 
श्वास बँदरिया।
आसमान में   
छिपा न मिलता 
इब्नबतूता।
मन पाखी को 
कैद कर सके 
कि

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