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सोमवार, 16 मई 2016

dewdaru

देवदारु मन हो सके
संजीव
*
देवदारु-मन हो सके
बाधा-गिरि-आसीन
धरती में पग जमा-सुन
मेघ-सफलता-बीन
*
देवों से वरदान पा 
काम मनुज के आ रहा
पत्ते लकड़ी फूल फल
दोनों हाथ लुटा रहा
रिक्त न कोष कभी हुआ
हुआ न दाता दीन
देवदारु-मन हो सके
बाधा-गिरि-आसीन
*
लाभ अमर्यादित गहा
हम मानव पछता रहा
विकरण कॉस्मिक किरण का
देवदारु बतला रहा
शङ्क्वाकारी छत्र दे
शरण न छाया क्षीण
देवदारु-मन हो सके

बाधा-गिरि-आसीन
*
त्वचा रोग को दूर कर
मेटे सूजन-शीत भी
मजबूती दे भवन को
सज्जा करता घरों की
एक काट तो दस उगा
वसन न भू से छीन
देवों से वरदान पा 
काम मनुज के आ रहा
पत्ते लकड़ी फूल फल
दोनों हाथ लुटा रहा
रिक्त न कोष कभी हुआ
हुआ न दाता दीन
देवदारु-मन हो सके
बाधा-गिरि-आसीन
*
मिलिए देवदार से  
भगवान श्री कृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के हठ पर बैकुंठ से कल्पतरु भू पर ले आये तो देवलोक श्रीहीन हो गया। वहाँ अनियमिततायें फैलने, तपश्चर्या एवं सत्य पर आघात होने पर देवताओं ने श्रीकृष्ण से कहा- 'हे भगवन! कल्पतरु के अभाव में बैकुण्ठ श्रीहीन हो गया है।' श्रीकृष्ण ने कहा कि जहां श्री (लक्ष्मी) नहीं रहेगी वह स्थान तो श्रीहीन होगा ही। श्रीत्रयी (लक्ष्मी-सरस्वती-शक्ति) साक्षात विग्रह (सत्यभामा-रुक्मिणी-जाम्बवन्ती) रूप में धरती पर है। देवताओं ने विनटी की- 'हे प्रभो! आप तथा तीनो महादेवियों से वरदान पाकर श्री के भोग हेतु जो जन स्वर्ग आये है, उनका क्या होगा? क्या आप तथा त्रिदेवियों के वरदान निष्फल होंगे? तब श्रीकृष्ण एवं देवताओं ने त्रिदेवियोंसे प्रार्थना की। देवियों ने कहा 'कल्पतरु' के समान प्रभावी अन्य वृक्ष धरती पर हो तो कल्पतरु देवलोक को लौटाया जा सकता है। देवों ने अपनी शक्तिओं को एकत्रित कर कल्पतरु से भी श्रेष्ठ वृक्ष देवदार का निर्माण किया। कल्पतरु प्राणियों द्वारा किये पुण्य के बदले में उन्हें स्वर्गीय सुख देता था। पुण्य क्षीण होने पर प्राणी को वापस मृत्यु लोक आना पड़ता था। देवदार ऋद्धि-सिद्धि देने के साथ प्राणियों के पुण्यवर्द्धन का भी काम करता था।

देवदार के प्रभाव से भूवासी निर्व्याध हो सुख-चैन से रहने लगे। सात्विक गुणों ने प्राणियों की आयु में वृद्धि की। ब्रह्माण्ड का नियमन चक्र असंतुलित होने से जन्म, उत्सर्जन, संचलन, संवर्द्धन, पोषण, संश्लेषण, विश्लेषण आदि क्रियाएँ बाधित तथा देवता, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, सिद्ध, तपस्वी आदि की चर्या अमर्यादित होने लगी। लोगो देवदार के स्वभाव, प्रभाव एवं शक्ति पर आश्रित हो शारीरिक एवं मानसिक श्रम से दूर भागने लगे। इस अनाचार एवं अव्यवस्था से घबराकर सभी लोग आशुतोष भगवान शिव के पास पहुंचे। भगवान शिव ने कहा-
“यास्यत्यद्य तर्वन्शमभिगर्हितम प्रयुज्यते।
क्षयो जाते प्रभूतस्य खलु वृक्षं पुष्पान्वितम।”
अर्थात प्राणियों द्वारा इसके किसी भी अंश का अमर्यादित या अभिगर्हित प्रयोग होने पर इसकी शक्ति क्षीण हो कर इसमें फूल-फल लगने बंद हो जायेगें। सेवा सुश्रूषा से यदि देवदार वृक्ष फूले तो वह वृक्ष एवं पुष्प अनेक आदिदैविक, आदिभौतिक एवं आदिदैहिक विपदाओं का नाश कर देगा। लकड़ी को ईंधन व शव-दाह शव जलाना शुरू कर दिये। और इसमें फल-फूल लगना बंद हो गया। यदि देवदार वृक्ष फूले तो उसके पत्ते पुष्पों से आवृत्त कर घर में रखने से दरिद्रता, रोग, चिंता-भय आदि दूर हो जाते है।
गृहम रक्षति पत्रमस्य सर्वं गृहे पुष्प सन्युतम।
तर्वांगम नरं रक्षति यत्तरुवर सविग्रहम।”
देवदार के जवाकार पुष्पों के पराग कण तथा पत्ते का पर्णहरित (Chlorophyll & Chloroplast) क्रम विशेष से एक निश्चित एवं निर्धारित पद्धति से सजाकर रखने से ग्रह-नक्षत्र कृत कष्टों एवं विपदाओं का शमन होता है।

लद्दाख प्रान्त में वन्य चिकित्सक (ज्योतिषी)“आमची” कहे जाते है। वे देवदार के फूलो एवं पत्तो के संयोग से एक यंत्र बनाकर अनेक कठिन रोगों का सफल एवं स्थाई इलाज़ करते हैं। पश्तो भाषा में लिखित “विल्लाख चासू” नामक ज्योतिष ग्रन्थ के अनुसार आयसी (रेवती), मंचूक (अश्विनी), खन्श (मूल), दायला (मघा) एवं खिचास्तो (अश्लेषा) में जन्मे व्यक्तियों पर इस वृक्ष के पत्ते प्रभावी नहीं होते हैं। सरकार द्वारा देवदार के फूलनेवलोे वृक्ष सुरक्षित एवं प्रतिबंधित हैं। दुर्लभ होने के कारण देवदार के फूलों की काला बाजारी होती है।

देवदार पिनाएसिई वंश का शोभायमान,  फैलावदार, सदाबहार तथा दीर्घजीवी वृक्ष है। इसका  (वैज्ञानिक नाम सेडरस डेओडारा (Cedrus Deodara), संस्कृत नाम देवदारु, देवतरु, अंग्रेज़ी नाम हिमालयन सेडार Himalayan Cedar, उर्दू नाम  ديودار देओदार) है । यह पश्चिमी हिमालय, पूर्वी अफगानिस्तान, उत्तरु पाकिस्तान, उत्तर-मध्य भारत, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, दक्षिणी-पश्चिमी तिब्ब्त एवं पश्चिमी नेपाल में १५०० से ३५०० फुट की ऊँचाई पर होता है। इसे शोभा के लिये इंग्लैण्ड और अफ्रीका में भी उगाया जाता है। इसके बीज से पौधे उगाकर पहाड़ों पर रोप जाते हैं। अफ्रीका में इसे कलम से भी उगाया जाता है। यह सीधे तनेवाला, ४० मी. से ७५ मि. तक ऊँचा, २.५ मी. से ३.७५ मी. तक के घेरे वाला, सनोबर (फर) की तरह शङ्क्वाकारी वृक्ष है। इसके पत्ते हल्के हरे रंग के, मुलायम, लम्बे, कुछ गोलाई लिये तथा लकड़ी पीले रंग की, मजबूत, हल्की, सुगन्धयुक्त, सघन और रालयुक्त होती है। इसका तना बहुत मोटा होता है । इसकी श्रेष्ठ लकड़ी पर पानी, फफूंद तथा कीड़ों का असर नहीं होता। यह इमारती काम हेतु उपयुक्त होती है। देवदार लकड़ी का उपयोग रेल के स्लीपरों (लट्ठों), फर्नीचर, मकान के खिड़की-दरवाज़ों, अलमारियों, सोफे-कुर्सियों, पेन्सिल बनाने आदि में होता है। देवदार लकड़ी के छीलन और बुरादे से २.५% से ४% तक वाष्पशील तेल मिलता है जो 'हिमालयी सेडारवुड तेल' के नाम से प्रसिद्ध है। तेल निकलने के बाद बचा छीलन और बुरादा ईंधन के रूप में उपयोगी होते हैं 

देवदार का उपयोग आयुर्वेदिक औषधि व उपचार में भी होता है। इसलिए लकड़ी के भंजक आसवन से प्राप्त तेल त्वचा रोगों तथा भेड़-घोड़ों आदि के बाल के रोगों में किया जाता है। इसके पत्तों में अल्प वाष्पशील तेल के साथ-साथ एस्कॉर्बिक अम्ल भी मिलता है। इसके हरे लालिमायुक्त पत्तों का स्वाद तीखा तेज, कर्कश, सुगन्धयुक्त तथा तासीर गर्म होती है। इसका अधिक मात्रा में उपयोग फेफड़ों हेतु हानिप्रद होता है। कतीरा और बादाम का तेल देवदार के दोषों को नष्ट करते हैं। यह सूजन व शीत पीड़ा मिटाता है, पथरी तोड़ता है तथा इसके गुनगुने काढ़े में बैठने से गुदा के सभी प्रकार के घाव नष्ट हो जाते है।

जापान के नागोया विश्वविद्यालय के छात्रों ने देवदार के २ प्राचीन वृक्षों में ब्रम्हांडीय विकरण से निकलनेवाले कार्बन आइसोटोप कार्बन-१४ की मात्रा में वृद्धि से ज्ञात किया है कि ७७४ ई. से ७७५ ई. के मध्य  पृथ्वी पर कॉस्मिक रे का रहस्यमय विस्फोट हुआ था। शोधक दल के नायक फुसा मियाके के अनुसार इस अवधि में दोनों वृक्षों में कार्बन-१४ के स्तर  में १.२% की वृद्धि पायी गयी

पहाड़ी संस्कृति का अभिन्न अंग देवदार कवियों-लेखकों का प्रेरणास्रोत है। यह हिमाचल प्रदेश (भारत) तथा पाकिस्तान का राष्ट्रीय वृक्ष है 

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