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सोमवार, 16 मई 2016

geet muktika

गीत-मुक्तिका 
संजीव 
*
जीना न इसे आया, मरना न उसे भाया 
हर बशर यहाँ नाखुश, संसार अजब माया
हर रोज सजाता है, 
सोचे कि आप सजता 
आखिर न बचा पाता, 
नित मिट रही सुकाया   
आये-गये अकेले, कोई न साथ साथी 
क्यों जोड़ रहा पल-पल? कण-कण यहाँ पराया  
जीना न इसे आया, मरना न उसे भाया 
सँग कौन कभी आता?
सँग कौन कभी जाता?
अपना जिसे बताता , 
तम में न संग काया 
तू वृक्ष तो लगाये , फल अन्य 'सलिल' खाये 
संतोष यही कर ले, सुंदर जहां बनाया   
जीना न इसे आया, मरना न उसे भाया 
.  
 
मत जोड़-घटा निश-दिन,
आनंद बाँट मत गिन 
जो भी यहाँ लुटाया , 
ले मान वही पाया  
नित जला प्राण-बाती, चुप उषा मुस्कुराती 
क्यों जोड़ रहा पल-पल? कण-कण यहाँ पराया  
जीना न इसे आया, मरना न उसे भाया 
जो तुझे जन्म देती,
कब बोल मोल लेती? 
जो कुछ रचा-सुनाया, 
क्यों मोल कुछ लगाया?  
साखी सिखा कबीरा, बानी सुना फ़कीरा 
मरकर हुए अमर हैं,  कब काल मिटा पाया?
जीना न इसे आया, मरना न उसे भाया 
मत ग्रंथि पाल पगले!,
जी जहाँ कहे बस ले? 
भू बिछा, गगन ओढ़ा  
सँग पवन खिलखिलाया     
मत प्रेम-पंथ तजना, मत भूल भजन भजना 
खुद में खुदी खुदा है,  मत भूल सच भुलाया 
जीना न इसे आया, मरना न उसे भाया 
.  
मापनी २२११  २२२२  २११२  २२ = २४ 
चौबीस मात्रिक अवतारी जातीय दिगपाल छन्द
बहर मफऊल फ़ायलातुन मफऊल फ़ायलातुन

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