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शनिवार, 14 मई 2016

meera-tulsi sanvad

मीरां - तुलसी संवाद 

कृष्ण भक्त मीरां बाई और रामभक्त तुलसीदास के मध्य हुआ निम्न पत्राचार शंका समाधान के साथ पारस्परिक विश्वास और औदार्य का भी परिचायक है इष्ट अलग -अलग होने और पूर्व परिचय न होने पर भी दोनों में एक दूसरे के प्रति सहज सम्मान का भाव उल्लेखनीय है काश हम सब इनसे प्रेरणा लेकर पारस्परिक विचार - विनिमय से शंकाओं का समाधान कर सकें-

राजपरिवार ने राजवधु मीरां को कृष्ण भक्ति छोड़कर सांसारिक जीवन यापन हेतु बाध्य करना चाहा। पति भोजराज का प्रत्यक्ष विरोध न होने पर हबी ननद ऊदा ने मीरां को कष्ट देने में कोई कसर न छोड़ी। प्रताड़ना असह्य होने पर मीरां ने तुलसी को पत्र भेजा-


स्वस्ति श्री तुलसी कुलभूषण दूषन- हरन गोसाई।
बारहिं बार प्रनाम करहूँ अब हरहूँ सोक- समुदाई।।
घर के स्वजन हमारे जेते सबन्ह उपाधि बढ़ाई।
मेरे माता- पिता के समहौ, हरिभक्तन्ह सुखदाई।
साधु- सग अरु भजन करत माहिं देत कलेस महाई।।
हमको कहा उचित करिबो है, सो लिखिए समझाई।।


हे कुलभूषण! दूषण को मिटानेवाले, गोस्वामी तुलसीदास जी सादर प्रणाम। आपको बार - बार प्रणाम करते हुए निवेदन है कि मेरे ागनिक शोकों को हरने की कृपा करें। हमारे घर के जितने स्वजन (परिवारजन) हैं वे हमारी पीड़ा बढ़ा रहे हैं यहाँ 'उपाधि' शब्द का प्रयोग व्यंगार्थ में है, व्यंग्य करते हुए सम्मानजनक शब्द इस तरह कहना कि उसका विपरीत अर्थ सुननेवाले को अपमानजनक लगकर चुभे और दर्द दे। साधु - संतों के साथ बैठकर भजन करने पर वे मुझे अत्यधिक क्लेश देते हैं। आप मेरे माता - पिता के समकक्ष तथा ईश्वर के भक्तों को सुख देनेवाले हैं । मुझे समझाकर लिखिए कि मेरे लिए क्या करना उचित है?


मीराबाई के पत्र का जबाव तुलसीदास ने इस प्रकार दिया:-
जाके प्रिय न राम बैदेही।
सो नर तजिए कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेही।।
नाते सबै राम के मनियत सुह्मद सुसंख्य जहाँ लौ।
अंजन कहा आँखि जो फूटे, बहुतक कहो कहां लौ।।


तुलसी के समक्ष धर्म संकट यह था कि उनसे एक भक्त और राजरानी मार्गदर्शन चाह रही थी जिसके इष्ट भिन्न थे वे मन भी कर सकते थे, मौन भी रह सकते थे। मीरा को राजपरिवार के विपरीत जाने को कहते तो राज परिवार की नाराजी झेलनी पड़ती, मीरां के कष्ट भी बढ़ाते। राज परिवार की बात मानने को कहते तो मीरां को इश्वर भक्ति छोड़नी पड़ती जो स्वयं ईश्वर भक्त होने के नाते तुलसी कर नहीं सकते थे। तुलसी ने आदर्श और व्यवहार में समन्वय बैठाते हुए उत्तर में बिना संबोधन किये मीरां को मार्गदर्शन दिया ताकि मीरा पर परपुरुष का पत्र मिलने का आरोप न लगाया जा सके। तुलसी ने लिखा- जिसको भगवान राम और भगवती सीता अर्थात अपना इष्ट प्रिय न हो उसे परम प्रिय होने भी करोड़ों शत्रुओं के समान घातक समझते हुए त्याग देना चाहिए। (यहाँ मीरां को संकेत है कि वे राजपरिवार और राजमहल त्याग दें, जिसका मीरां ने पालन भी किया और कृष्ण मंदिर को निवास बन लिया)। जीवन में जितने भी सम्बन्ध हैं वे सब वहीँ तक मान्य हैं जहाँ तक भगवान् की उपासना में बाधक न हों। आज अंजान किस काम का जो आँख हो फोड़ दे अर्थात वह नाता पालने योग्य नहीं है जिसके कारण अपना इष्ट भगवद्भक्ति छोड़ना पड़े। इससे अधिक और क्या कहूँ?

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