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शनिवार, 28 मई 2016

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तुमको देखा  
तो मरुथल मन 
हरा हो गया।  
*
रूप अरूप स्वरूप लुभाये 
जल में बिम्ब हाथ कब आये?
जो ललचाये, वह पछताये 
जिसे न दीखा, वह भरमाये 
किससे पूछें 
कब अपरा, 
कब परा हो गया?
तुमको देखा  
तो मरुथल मन 
हरा हो गया।  
*
तुममें खुद को देख रहा मन 
खुदमें तुमको लेख रहा मन 
चमन-अमन की चाह सुमन सम  
निज में ही अवरेख रहा मन   
फूला-फला 
बिखर-निखरा   
.निर्भरा हो गया। 
तुमको देखा  
तो मरुथल मन 
हरा हो गया।  
*
कहे अजर यद्यपि है जर्जर 
मान अमर पल-पल जाता मर। 
करे तारने का दावा पर  
खुद ही अब तक नहीं सका तर। 
माया-मोह 
तजा ज्यों हो 
अक्षरा हो गया। 
तुमको देखा  
तो मरुथल मन 
हरा हो गया।  
***
२८-५-२०१६

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