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बुधवार, 25 मई 2016

samiksha

पुस्तक समीक्षा-  
काल है संक्राति का
                                                                                                                                                                                    - सुरेन्द्र सिंह पॅवार
[कृति- काल है संक्राति का, ISBN 817761000-7, गीत-नवगीत संग्रह, कृतिकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल, प्रकाशक- समन्वय प्रकाशन, 204 अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर 482001, मूल्य - 200/-]
                                                                               *
                   ‘काल है संक्रांति का’  'सलिल' जी की दूसरी पारी का प्रथम गीत-नवगीत संग्रह है।  ‘सलिल’ जी की शब्द और छन्द के प्रति अटूट निष्ठा है। हिन्दी पञ्चांग और अंग्रेजी कलेण्डर में मकर संक्रांति एक ऐसा पर्व है जो प्रतिवर्ष चौदह जनवरी को मनाया जाता है। इस दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। इसी दिन से शिशिर ऋतु का एवं उत्तरायण का प्रारंभ माना गया है। इसी के आसपास, गुजरात में पतंगोत्सव, पंजाब में लोहड़ी, तामिलनाडु में पोंगल, केरल में अयप्पा दर्शन, पूर्वी भारत में बिहू आदि पर्वों की वृहद श्रृंखला है जो ऋतु परिवर्तन को लोक पर्व के रूप में मनाकर आनंदित होती है। भारत के क्षेत्र में पवित्र नदियों एवं सरोवरों के तट पर स्नान दान और मेलों की परम्परा है।

                   संग्रह के ज्यादातर नवगीत 29 दिसम्बर 2014 से 22 जनवरी 2015 के मध्य रचे गये हैं। यह वह संक्रांति काल है, जब दिल्ली में ‘आप’ को अल्पमत और केजरीवाल द्वारा सरकार न चलाने का जोखिम भरा निर्णय, मध्यप्रदेश सहित कुछ अन्य हिन्दी भाषी राज्यों में भाजपा को प्रचंड बहुमत तथा केन्द्र में प्रधानमंत्री मोदी जी की धमाकेदार पेशवाई से तत्कालीन राजनैतिक परिदृश्य बदला-बदला सा था। ऐसे में कलम के सिपाही ‘सलिल’ कैसे शांत रहते? उन्हें विषयों का टोटा नहीं था, बस कवि-कल्पना दौड़ाई और मुखड़ों-अंतरों की तुकें मिलने लगी। सलिल जी ने गीत नर्मदा के अमृतस्य जल को प्रत्यावर्तित कर नवगीतरूपी क्षिप्रा में प्रवाहमान, किया, जिसमें अवगाहन कर हम जैसे रसिक श्रोता / पाठक देर तक और दूर तक गोते लगा सकते हैं । कहते है, नवगीत गीत का सहोदर है, जो अपनी शैली आप रचकर काव्य को उद्भाषित करता है । सलिल - संग्रह के सभी गीत नवगीत नहीं हैं परन्तु जो नवगीत हैं वे तो गीत हैं ही ।

                   डॉ. नामवरसिंह के अनुसार ‘‘नवगीत अपने नये रूप’ और ‘नयी वस्तु’ के कारण प्रासंगिक हो सका हैं ।’’ क्या है नवगीत का ‘नया रूप’’ एवं ‘नयी वस्तु’? बकौल सलिल - 
नव्यता संप्रेषणों में जान भरती, 
गेयता संवेदनों का गान करती।
कथ्य होता, तथ्य का आधार खाँटा,
सधी गति-यति अंतरों का मान करती।
अंतरों के बाद, मुखड़ा आ विहँसता,
मिलन की मधु बंसरी, है चाह संजनी।
सरलता-संक्षिप्तता से बात बनती,
मर्म बेधकता न हो तो रार ठनती।
लाक्षणिता भाव, रस, रूपक सलोने,
बिम्ब टटकापन मिलें, बारात सजती।
नाचता नवगीत के संग, लोक का मन
ताल-लय बिन, बेतुकी क्यों रहे कथनी।।

                   वैसे गीत में आने वाले इस बदलाव की नव्यता की सूचना सर्वप्रथम महाकवि निराला ने ‘‘नवगति नवलय, ताल छन्द नव’’ कहकर बहुत पहले दे दी थी । वास्तव में, नवगीत आम-आदमी के जीवन में आये उतार-चढ़ाव, संघर्ष-उत्पीड़न, दुख-तकलीफ-घुटन, बेकारी, गरीबी और बेचारगी की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है ।

                सलिल जी के प्रतिनिधि नवगीतों के केन्द्र में वह आदमी है, जो श्रमजीवी है, जो खेतों से लेकर फैक्ट्रियों तक खून-सीना बहाता हुआ मेहनत करता है, फिर भी उसकी अंतहीन जिंदगी समस्याओं से घिरी हुई हैं, उसे प्रतिदिन दाने-दाने के लिए जूझना पड़ता है । ‘मिली दिहाड़ी’ नवगीत में कवि ने अपनी कलम से एक ऐसा ही दृश्य उकेरा है -

चाँवल-दाल किलो भर ले ले
दस रुपये की भाजी।
घासलेट का तेल लिटर भर
धनिया-मिर्ची ताजी।

तेल पाव भर फल्ली का
सिंदूर एक पुड़िया दे-
दे अमरुद पाँच का, बेटी की
न सहूँ नाराजी

खाली जेब पसीना चूता,
अब मत रुक रे मन बेजार ।
मिली दिहाड़ी, चल बाजार ।।

                   नवगीतों ने गीत को परम्परावादी रोमानी वातावरण से निकालकर समष्टिवादी यथार्थ और लोक चेतना का आधार प्रदान करके उसका संरक्षण किया है। सलिल जी के ताजे नवगीतों में प्रकृति अपने समग्र वैभव और सम्पन्न स्वरूप में मौजूद है। दक्षिणायन की हाड़ कँपाती हवाएँ हैं तो खग्रास का सूर्यग्रहण भी है । सूर्योदय पर चिड़िया का झूमकर गाया हुआ प्रभाती गान है तो राई-नोन से नजर उतारती कोयलिया है -

ऊषा किरण रतनार सोहती ।
वसुधा नभ का हृदय मोहती ।
कलरव करती मुनमुन चिड़िया
पुरवैया की बाट जोहती ।।

गुनो सूर्य लाता है
सेकर अच्छे दिन ।।

                   सलिल जी ने नवगीतों में सामाजिक-राजनैतिक विकृतियों एवं सांस्कृतिक पराभवों की काट में पैनी व्यंजक शैली अपनाते हुए अपनी लेखनी को थोड़ा टेढ़ा किया है । ‘शीर्षासन करती सियासत’, ‘नाग-साँप फिर साथ हुए’, ‘राजनीति तज दे तन्दूर’, ‘गरीबी हटाओ की जुमलेबाजी’, ‘अच्छे दिन जैसे लोक लुभावन नारे धारा तीन सौ सत्तर, काशी-मथुरा-अवध जैसे सभी विषय इन नवगीतो में रूपायित हुए हैं -

मंजिल पाने साथ चले थे
लिये हाथ में हाथ चले थे
दो मन थे, मत तीन हुए फिर
ऊग न पाये, सूर्य ढले थे

जनगण पूछे
कहेंः 'खैर है'

अथवा

हम में हर एक तीसमारखाँ 
कोई नहीं किसी से कम।
हम आपस में उलझ-उलझ कर
दिखा रहे हैं अपनी दम।
देख छिपकली डर जाते पर
कहते डरा न सकता यम।
आँख के अंधे, देख न देखें
दरक रही है दीवारें।

                   देखा जा रहा है कि नवगीत का जो साँचा आज ये 60-65 वर्ष पूर्व तैयार किया गया था, कुछ नवगीतकार उसी से चिपक कर रह गये हैं। आज भी वे सीमित शब्द, लय और बिम्बात्मक सम्पदा के आधार पर केवल पुनरावृत्ति कर रहे हैं। सलिल जी जैसे नवगीतकार ही हैं, जो लीक से हटने का साहस जुटा पा रहे हैं, जो छंद को भी साध रहे हैं और बोध को भी सलिल जी के इन नवगीतों में परम्परागत मात्रिक और वर्णिक छंदों का अभिनव प्रयोग देखा गया है विशेषकर दोहा, सोरठा, हरिगीतिका, आल्हा और सवैया का । इनमें लोक से जुड़ी भाषा है, धुन है, प्रतीक हैं। इनमें चूल्हा-सिगड़ी है, बाटी-भरता-चटनी है, लैया-गजक है, तिल-गुड़ वाले लडुआ हैं, सास-बहू, ननदी-भौनाई के नजदीकी रिश्ते हैं, चीटी-धप्प, लँगड़ी, कन्नागोटी, पिट्टू, कैरम हैं, रमतूला , मेला, नौटंकी, कठपुतली हैं। ‘सुन्दरिये मुंदरिये, होय’, राय अब्दुला खान भट्टी उर्फ दुल्ला भट्टी की याद में गाये जाने वाला लोहड़ी गीत है, ईसुरी की चौकड़िया फाग पर आधारित -

‘मिलती काय ने ऊँचीवारी, कुर्सी हमखों गुंइया है’।

                   सलिल जी के इन गीतों / नवगीतों को लय-ताल में गाया जा सकता है, ज्यादातर तीन से चार बंद के नवगीत हैं। अतः, पढ़ने-सुनने में बोरियत या ऊब नहीं होती। इनमें फैलाव था विस्तार के स्थान पर कसावट है, संक्षिप्तता है। भाषा सहज है, सर्वग्राही है। कई बार सूत्रों जैसी भाषा आनंदित कर देती है। जैसे कि, भवानी प्रसाद तिवारी का एक सुप्रसिद्ध गीत है- ‘‘मनुष्य उठ! मनुष्य को भुजा पसार भेंट ले।’’ अथवा इसी भावभूमि कर चन्द्रसेन विराट का गीत है - ‘‘मिल तो मत मन मारे मिल, खुल कर बाँह पसारे मिल’’ सलिल जी ने भावों के प्रकटीकरण में ‘भुजा-भेंट’ का प्रशस्त - प्रयोग किया है। 

                   सलिल द्वारा सूरज के लिए ‘सूरज बबुआ’ का जो सद्य संबोधन दिया है वह आने वाले समय में ‘‘चन्दा मामा’’ जैसी राह पकडे़गा। मिथकों के सहारे जब सलिल के सधे हुए नवगीत आगे बढ़ते हैं तो उनकी बनक उनकी रंगत और उनकी चाल देखते ही बनती है -

अब नहीं है वह समय जब
मधुर फल तुममें दिखा था।
फाँद अम्बर पकड़ तुमको
लपककर मुँह में रखा था।
छा गया दस दिशा तिमिर तब
चक्र जीवन का रुका था।
देख आता वज्र, बालक
विहँसकर नीचे झुका था।

हनु हुआ घायल मगर
वरदान तुमने दिये सूरज।

                   और एक बात, सलिल जी नवगीत कवि के साथ-साथ प्रकाशक की भूमिका में भी जागरूक दिखाई दिये, बधाई। संग्रह का आवरण एवं आंतरिक सज्जा उत्कृष्ट है। यदि वे चाहते तो कृति में नवगीतों, पुनर्नवगीतों; जिनमें नवगीतों की परम्परा से इतर प्रयोग हैं और गीतों को पृथक-प्रखंडित करने एवं पाँच गीतों, नवगीतों, वंदन, स्तवन, स्मरण, समर्पण और कथन की सुदीर्घ काव्यमय आत्म कथ्य को सीमित करने का संपादकीय जोखिम अवश्य उठा सकते थे। सलिल जी ने अपने सामाजिक स्तर, आंचलिक भाषा, उपयुक्त मिथक, मुहावरों और अहानो (लोकोक्तियों) के माध्यम से व्यक्तिगत विशिष्टाओं का परिचय देते हुए हमें अपने परिवेश से सहज साक्षात्कार कराया है, इसके लिये वे साधुवाद के पात्र हैं।

                   ‘उम्मीदों की फसल उगाते’ और ‘उजियारे की पौ-बारा’ करते ये नवगीत नया इतिहास लिखने की कुब्बत रखते हैं। ये तो शुरूआत है, अभी उनके और-और स्तरीय नवगीत संग्रह आयेंगे, यही शुभेच्छा है।
201, शास्त्री नगर गढ़ा, जबलपुर-3 म.प्र., मोबाईल 9300104296

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