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शुक्रवार, 10 जून 2016

प्रो सी बी श्रीवास्तव की कुछ हिन्दी गजले

  गजल
प्रो सी बी  श्रीवास्तव विदग्ध
OB 11, विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
फोन ०७६१ २६६२०५२, ०९४२५८०६२५२
vivek1959@yahoo.co.in

हमें दर्द दे वो जीते, हम प्यार करके हारे,
जिन्हें हमने अपना माना, वे न हो सके हमारे।

ये भी खूब जिन्दगी का कैसा अजब सफर है,
खतरों भरी है सड़के, काटों भरे किनारें।।

है राह एक सबकी मंजिल अलग-अलग है,
इससे भी हर नजर में हैं जुदा-जुदा नजारे।

बातें बहुत होती हैं, सफरों में सहारों की
चलता है पर सड़क में हर एक बेसहारे।

कोई किसी का सच्चा साथी यहाॅ कहाॅ है ?
हर एक जी रहा है इस जग मंे मन को मारे।

चंदा का रूप सबको अक्सर बहुत लुभाता,
पर कोई कुछ न पाता दिखते जहाॅ सितारे।

देखा नहीं किसी ने सूरज सदा चमकते
हर दिन के आगे पीछे हैं साॅझ औ’ सकारे।

सुनते हैं प्यार का भी देते हैं कई दुहाई।
थोड़े हैं किंतु ऐसे होते जो सबके प्यारे।


गजल
प्रो सी बी  श्रीवास्तव विदग्ध
OB 11, विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
फोन ०७६१ २६६२०५२, ०९४२५८०६२५२
vivek1959@yahoo.co.in
मेरे साथ तुम जो होते, न मैं बेकरार होता,
खुद से भी ष्षायद ज्यादा, मुझे तुमसे प्यार होता।

तुम बिन उदास मेरी मायूस जिन्दगी है,
होते जो पास तुम तो क्यों इन्तजार होता ?

मजबूरियाॅ तुम्हारी तुम्हें दूर ले गईं हंै,
वरना खुषी का हर दिन एक तैवहार होता।

मुूह माॅगी चाह सबको मिलती कहाॅ यहाॅ है ?
मिलती जो, कोई सपना क्यों तार-तार होता ?

हॅसने के वास्ते कुछ रोना है लाजिमी सा,
होता न चलन ये तो दिल पै न भार होता।

मुझकों जो मिले होते मुस्कान लिये तुम तो,
इस जिन्दगी में जाने कितना खुमार होता।

आ जाते जिन्दगी में मेरे राजदार बन जो,
सपनों की झाॅकियों का बढ़िया सिंगार होता।

हर रात रातरानी खुषबू बिखेर जाती,
हर दिन आलाप भरता सरगम-सितार होता।

तकदीर है कि ’यादों’ में आते तो तुम चुप हो,
पर काष कि किस्समत में कोई सुधार होता।।


जिन्दगी (गजल)
प्रो सी बी  श्रीवास्तव विदग्ध
OB 11, विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
फोन ०७६१ २६६२०५२, ०९४२५८०६२५२
vivek1959@yahoo.co.in

सुख दुखों की एक आकस्मिक रवानीं जिंदगी
हार-जीतों की की बड़ी उलझी कहानीं जिंदगी
व्यक्ति श्रम और समय को सचमुच समझता बहुत कम
इसी से संसार में धूमिल कई की जिंदगी ।।1।।
कहीं कीचड़ में फॅसी सी फूल सी खिलती कहीं
कहीं उलझी उलझन में, दिखती कई की।
पर निराषा के तमस में भी है आषा की किरण
है इसीसे तो है सुहानी दुखभरी भी जिंदगी ।।2।।
कहीं तो बरसात दिखती कहीं जगमग चाॅदनी
कहीं हॅसती खिल-खिलाती कहीं अनमन जिंदगी।
भाव कई अनुभूतियाॅ कई, सोच कई, व्यवहार कई
पर रही नित भावना की राजधानी जिंदगी ।।3।।
 सह सके उन्होंने ही सजाई है कई की जिंदगी
कठिनाई से जो उनने नित रचा इतिहास
सुलभ या दुख की महत्ता कम, महत्ता है कर्म की
कर्म से ही सजी सॅवरी हुई सबकी जिंदगी ।।4।।


गजल
प्रो सी बी  श्रीवास्तव विदग्ध
OB 11, विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
फोन ०७६१ २६६२०५२, ०९४२५८०६२५२
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मोहब्बत से नफरत की जब मात होगी,
तो दुनिया में सचमुच बड़ी बात होगी।

यहाॅ आदमी-आदमी जब बनेगा,
तभी दिल से दिल की सही बात होगी।

हरेक घर में खुषियों की होंगी बहारें,
कहीं भी न आॅसू की बरसात होगी।

चमक होगी आॅखों में, मुस्कान मुंह पै,
सजी मन में सपनों की बारात होगी।

सुस्वागत हो सबके सजे होंगे आॅगन,
सुनहरी सुबह, रूपहली रात होगी।

न होगा कोई मैल मन में किसी के,
जहाॅ पे ये अनमोल सौगात होगी।

सभी मजहब आपस में मिल के रहेंगे,
नई जिंदगी की षुरूआत होगी।


गजल

बहुत कमजोर है मन
प्रो सी बी  श्रीवास्तव विदग्ध
OB 11, विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
फोन ०७६१ २६६२०५२, ०९४२५८०६२५२
vivek1959@yahoo.co.in

बहुत कमजोर है ये मन जहाॅ जाता फिसल जाता
समझने को बहुत है, पर बहुत कम ये समझ पाता।।
धरा पर हर कदम हर क्षण अनेकों दिखते आकर्षण
जहाॅ भी ये चला जाता, बचा खुद को नहीं पाता।।
अचानक ही लुभा लेती दमकती रूपसी माया
सदा अनजान सा नादान ये लालच में फॅस जाता।।
जहाॅ मिलती कड़कती धूप में इसको घनी छाया
वहीं पर बैठ कुछ पल काटने को ये ललच जाता।।
तरसता है उसे पाने, जहाॅ दिखती सरसता है
जिन्हें अपना समझता है नहीं उनसे कोई नाता।।
नदी से तेज बहती धार है दुनियाॅ में जीवन की
कहीं भी अपनी इच्छा से नहीं कोई ठहर पाता।।
सयाने सब बताते है, ये दुनियाॅ एक सपना है
जो भी मिलता है सपने में नहीं कोई काम है आता।।
सिमटते जब सुहाने दिन धुंधली षाम जाती है
समय जबलपुर बीत जाता है दुखी मन बैठ पछताता।।
भले वे हैं जो आने वाले कल का ध्यान रखते हैं
उन्हीं के साथ औरों का भी जीवन तक सॅवर जाता।।


गजल
प्रो सी बी  श्रीवास्तव विदग्ध
OB 11, विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
फोन ०७६१ २६६२०५२, ०९४२५८०६२५२
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परेषानी हुआ करती हैं दिल को इन्तजारों में
खुषी मिलती भला किसकों कभी झूठे सहारों में।
किसी के आसरे का सच में कोई भी भरोसा क्या ?
मिलीं नाकामियाॅ उनसे भी थे जो हम गवारों में।
जहाॅ जो आज है षायद न कल वैसा वहाॅ होगा
बदलती रहती है दुनियाॅ, नये दिन नये नजारों में।
कहाॅ पर्वत ढहेंगे कल, कहाॅ भूचाल आयेंगे
नजूमी भी बता सकते नहीं पढ़के सितारों में।
किसी के कल के बारे में कहा कुछ भी न जा सकता
हुआ करते फरक कईयों के कामों औ’ विचारों में।
कभी जिन्ना अलमबरदार थे हिन्दू मुसलमाॅ के
औ’ जाते-जाते थे हिन्दोस्ताॅ के जाॅ निसारों में।
बना गये मगर पाकिस्ताॅ, मिटा दस लाख लोगों को
जो सदियों से बसे थे अपने घर औ’ कारबारों में।
हुई बरबादियाॅ जैसी कभी भूली न जायेंगी
बराबर याद की जायेंगी नये इतिहासकारों में।
चमक तो ऊपरी दिखती सभी आॅखें को आकर्षक
मगर दिल की चमक होती किसी इक की हजारों में।
किसी के दिल को कोई पर भला कब जान पाया है ?
दमकते हीरों से ज्यादा है ककड़ आबषारों में।
वहीं ’इकबाल’ जिनने लिख्खा था ’हिन्दोस्ताॅ प्यारा’
चले गये छोड़ हिन्दोस्ताॅ, बॅटा इसको दो धारों में।
मन में और कुछ होता है, मुॅह कुछ और कहता है
कभी दिखती नहीं बिजली जो दौड़ा करती तारों में।
बहुत मुष्किल है कुछ भी भाॅप पाना कल कि क्या होगा।
हुआ करतीं बहुत सी बातें जब केवल इषारों में।
हजारों बार धोखे उनसे भी मिलते जो अपने हैं
सचाई को छुपाये रखते हैं, मन के विचारों में।
भला इससे सही है अपने पैरों पै खड़े होना
नहीं अच्छा समय खोना निरर्थक इन्तजारों में।
गजल
प्रो सी बी  श्रीवास्तव विदग्ध
OB 11, विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
फोन ०७६१ २६६२०५२, ०९४२५८०६२५२
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बीत गये जो दिन उन्हंे वापस कोई पाता नहीं
पर पुरानी यादों को दिल से भुला पाता नहीं।
बहती जाती है समय के साथ बेवस जिंदगी
समय की भॅवरों से बचकर कोई निकल पाता नहीं।
तरंगे दिखती हैं मन की उलझनें दिखती नहीं
तट तो दिखते हैं नदी के तल नजर आता नहीं।
आती रहती हैं हमेषा मौसमी तब्दीलियाॅ
पर सहज मन की व्यथा का रंग बदल पाता नहीं।
छुपा लेती वेदना को अधर की मुस्कान हर
दर्द लेकिन मन का गहरा कोई समझ पाता नहीं।
उतर आती यादें चुप जब देख के तन्हाइयाॅ
वेदना की भावना से कोई बच पाता नहीं।
जगा जाती आके यादें सोई हुई बेचैनियाॅ
किसी की मजबूरियों को कोई समझ पाता नहीं।
जुड़ गया है आॅसुओं का यादों से रिष्ता सघन
चाह के भी जिसकोे कोई अब बदल पाता नहीं।


आदमी (गजल)
प्रो सी बी  श्रीवास्तव विदग्ध
OB 11, विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
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आदमी से बड़ा दुष्मन आदमी का कौन है ?
गम बढ़ा सकता जो लेकिन गम घटा सकता नहीं।।
हड़प सकता हक जो औरों का भी अपने वास्ते
काट सकता सर कई, पर खुद कटा सकता नहीं।।
बे वजह, बिन बात समझे, बिना जाने वास्ता
जान ले सकता किसी की, जान दे सकता नहीं।।
कर जो सकता वारदातें, हर जगह, हर किस्म की
पर किसी को, माॅगने पर प्यार दे सकता नहीं।।
चाह कर भी मन के जिसकी थाह पाना है कठिन
हॅस तो सकता है, मगर खुल कर हॅसा सकता नहीं।।
रहके भी बस्ती में अपना घर बनाता है अलग
साथ रहता सबके फिर भी साथ पा सकता नहीं।।
नियत गंदी, नजर पैनी, चलन में जिके दगा
बातें ऐसी घाव जिनका सहज जा सकता नहीं।।
सारी दुनियाॅ में यही तो कबड्डी का खेल है
पसर जो पाया जहाॅ पर, फिर सिमट सकता नहीं।।
कैसे हो विष्वास ऐसे नासमझ इन्सान पर
जो पटाने में है सबको खुद पै पट सकता नहीं।।


कहीं भी मन नहीं लगता
प्रो सी बी  श्रीवास्तव विदग्ध
OB 11, विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
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लगाना चाहता हूॅ पर कहीं भी मन नहीं लगता
जगाना चाहता उत्साह पर मन में नहीं जगता।।
न जाने क्या हुआ है छोड़ जब से तुम गई हमको
उदासी का कुहासा है सघन, मन से नही हटता
वही घर है, वही परिवार, दुनियाॅ भी वही जो थी
मगर मन चाहने पर भी किसी रस में नही पगता।।
तुम्हें खोकर के सब सुख चैन घर के उठ गये सबके
घुली है मन में पीड़ा किसी का भी मन नहीं लगता।।
तुम्हारे साथ सुख-संतोष-सबल जो मिले सबको
उन्हीं की याद में उलझा किसी का मन नहीं लगता।।
अजब सी खीझ होती है मुझे तो जगमगाहट से
अचानक आई आहट का वनज अच्छा नहीं लगता।।
हमेषा भीड़-भड़भड़ से अकेलापन सुहाता है
तुम्हारी याद में चिंतन-मनन में मन नहीं लगता।।
सदा बेटा-बहू का प्यार-आदर मिल रहा फिर भी
तुम्हारी कमी का अहसास हरदम, हरजगह खलता।।
न जाने जिंदगी के आगे के दिन किस तरह के हों
नया दिन अच्छा हो फिर भी गये दिन सा नहीं लगता।।


आदमीयत से बड़ा जग में नही कोई धरम

गजल
प्रो सी बी  श्रीवास्तव विदग्ध
OB 11, विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
फोन ०७६१ २६६२०५२, ०९४२५८०६२५२
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आदमी को फूलों की खुषबू लुटानी चाहिये।
दोपहर में भी न मुरझा मुस्कराना चाहिये।।
बदलता रहता है मौसम, हर जगह पर आये दिन
बेवफा मौसम को भी अपना बनाना चाहियें।
मान अपनी हार अॅधियारों से डरना है बुरा
मिटाने को अॅधेरे दीपक जलाना चाहिये।
मुष्किलें आती हैं अक्सर हर जगह हर राह में
आदमी को फर्ज पर अपना निभाना चाहिये
क्या सही है, क्या गलत है, क्या है करना लाजिमी
उतर के गहराई में, खुद मन बनाना चाहिये।
जिन्दगी के दिन हमेषा एक से रहते नहीं
अपने खुद पर रख भरोसा बढ़ते जाना चाहिये।
जो भी जिसका काम हो, हो जिन्दगी में जो जहाॅ
नेक नियती से उसे करके दिखाना चाहिये।
आदमीयत से बड़ा जग में है नहीं कोई धरम
बच्चों को सद्भाव की घुट्टी पिलाना चाहिये।
चार दिन की जिंदगी में बाॅटिये सबको खुषी
खुदगरज होके न औरों को सताना चाहिये।
किसी का भी दिल दुखे न हो सदा ऐसा जतन
भलाई कर दूसरों की, भूल जाना चाहिये।


गजल
प्रो सी बी  श्रीवास्तव विदग्ध
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हिलमिल रहो दो दिन को सभी आये हुये है

परचम लिये मजहब का जो गरमाये हुये हैं
आवाज लगा लड़ने को जो आये हुये हैं।
उनको समझ नहीं है कि मजहब है किस लिये
कम अक्ल हैं बेवजह तमतमाये हुये हैं।
नफरत से सुलझती नहीं पेचीदगी कोई
यों किसलिये लड़ने को सर उठाये हुये हैं।
मजहब तो हर इन्सान की खुषियों के लिये हैं
ना समझी में अपनों को क्यों भटकाये हुये हैं।
औरों की भी अपनी नजर अपने खयाल हैं
क्यों तंगदिल ओछी नजर अपनाये हुये हैं।
दुनियाॅ बहुत बड़ी है औ’ ऊॅचा है आसमान
नजरें जमीन पै ही क्यों गड़ाये हुये है।
फूलों के रंग रूप औ’ खुषबू अलग है पर
हर बाग की रौनक पै सब भरमाये हुये हैं।
मजहब सभी सिखाते है बस एक ही रास्ता
हिल-मिल रहो, दो दिनों को सभी आये हुये हैं।
कुदरत भी यही कहती है-दुख को सुनो-समझो
जीने का हक खुदा से सभी पाये हुये हैं।
इन्सान वो इन्सान का जो तरफदार हो
इन्सानियत पै जुल्म यों क्यों ढाये हुये हैं।


गजल
प्रो सी बी  श्रीवास्तव विदग्ध
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पीड़ा का भारी बोझ ये उठाये हुये हैं

चोटों पै चोट दिल पै कई खाये हुये है।
दुख-दर्दो को मुस्कानों में बहलाये हुये हैं।।
जब से है होष सबके लिये खपता रहा मैं
पर जिनको किया सब, वही बल खाये हुये हैं।।
करता रहा हर हाल मुष्किलों का सामना
पर जाने कि क्यों लोग मुॅह फुलाये हुये हैं।।
गम खाके अपनी चोट किसी से न कह सका
हम मन को कल के मोह में भरमाये हुये हैं।।
लगता है अकेले कहीं पै बैठ के रोयें
किससे कहें कि कितने गम उठाये हुये हैं।।
औरों से षिकायत नहीं अपनों से गिला है
जो मन पै परत मैल की चिपकाये हुये हैं।।
दिल पूॅछता है मुझसे कि कोई गल्ती कहाॅ है ?
धीरज धरे पर उसको हम समझाये हुये हैं।।
देखा है इस दुनियाॅ में कई करके भी भलाई
अनजानों से बदनामी ही तो पाये हुये हैं।।
करके भी सही औरों को हम खुष न कर सके
पीड़ा का भारी बोझ ये उठाये हुये हैं।।

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