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सोमवार, 20 जून 2016

doha

दोहा सलिला
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जूही-चमेली देखकर, हुआ मोगरा मस्त 
सदा सुहागिन ने बिगड़, किया हौसला पस्त 
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नैन मटक्का कर रहे, महुआ-सरसों झूम 
बरगद बब्बा खाँसते। क्यों? किसको मालूम?
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अमलतास ने झूमकर, किया प्रेम-संकेत 
नीम षोडशी लजाई, महका पनघट-खेत 
अमरबेल के मोह में, फँसकर सूखे आम
कहे वंशलोचन सम्हल, हो न विधाता वाम 
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शेफाली के हाथ पर, नाम लिखा कचनार 
सुर्ख हिना के भेद ने, खोदे भेद हजार 
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गुलबकावली ने किया, इन्तिज़ार हर शाम 
अमन-चैन कर दिया है,पारिजात के नाम 
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गौरा हेरें आम को, बौरा हुईं उदास
मिले निकट आ क्यों नहीं, बौरा रहे उदास?
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बौरा कर हो गया है, आम आम से ख़ास
बौरा बौराये, करे दुनिया नहक हास
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२०-६-२०१६ 
lnct jabalpur 

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