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शनिवार, 25 जून 2016

geet

​​रचना-प्रति रचना 
राकेश खण्डेलवाल-संजीव सलिल 
दिन सप्ताह महीने बीते
घिरे हुए प्रश्नों में जीते
अपने बिम्बों में अब खुद मैं
प्रश्न चिन्ह जैसा दिखता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
भावों की छलके गागरिया, पर न भरे शब्दों की आँजुर
होता नहीं अधर छूने को सरगम का कोई सुर आतुर
छन्दों की डोली पर आकर बैठ न पाये दुल्हन भाषा
बिलख बिलख कर रह जाती है सपनो की संजीवित आशा
टूटी परवाज़ें संगवा कर
पंखों के अबशेष उठाकर
नील गगन की पगडंडी को
सूनी नजरों से तकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
पीड़ा आकर पंथ पुकारे, जागे नहीं लेखनी सोई
खंडित अभिलाषा कह देती होता वही राम रचि सोई
मंत्रबद्ध संकल्प, शरों से बिंधे शायिका पर बिखरे हैं
नागफ़नी से संबंधों के विषधर तन मन को जकड़े हैं
बुझी हुई हाथों में तीली
और पास की समिधा गीली
उठते हुए धुंए को पीता
मैं अन्दर अन्दर रिसता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
धरना देती रहीं बहारें दरवाजे की चौखट थामे
अंगनाई में वनपुष्पों की गंध सांस का दामन थामे
हर आशीष मिला, तकता है एक अपेक्षा ले नयनों में
ढूँढ़ा करता है हर लम्हा छुपे हुए उत्तर प्रश्नों में
पन्ने बिखरा रहीं हवायें
हुईं खोखली सभी दुआयें
तिनके जैसा, उंगली थामे
बही धार में मैं तिरता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
मानस में असमंजस बढ़ता, चित्र सभी हैं धुंधले धुंधले
हीरकनी की परछाईं लेकर शीशे के टुकड़े निकले
जिस पद रज को मेंहदी करके कर ली थी रंगीन हथेली
निमिष मात्र न पलकें गीली करने आई याद अकेली
परिवेशों से कटा हुआ सा
समीकरण से घटा हुआ सा
जिस पथ की मंज़िल न कोई
अब मैं उस पथ पर मिलता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
भावुकता की आहुतियां दे विश्वासों के दावानल में
धूप उगा करती है सायों के अब लहराते आँचल में
अर्थहीन हो गये दुपहरी, सन्ध्या और चाँदनी रातें
पड़ती नहीं सुनाई होतीं जो अब दिल से दिल की बातें
कभी पुकारा पनिहारी ने
कभी संभाला मनिहारी ने
चूड़ी के टुकडों जैसा मैं
पानी के भावों बिकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
मन के बंधन कहाँ गीत के शब्दों में हैं बँधने पाये
व्यक्त कहां होती अनुभूति चाहे कोई कितना गाये
डाले हुए स्वयं को भ्रम में कब तक देता रहूँ दिलासा
नीड़ बना, बैठा पनघट पर, लेकिन मन प्यासा का प्यासा
बिखराये कर तिनके तिनके
भावों की माला के मनके
सीपी शंख बिन चुके जिससे
मैं तट की अब वह सिकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
***
आदरणीय राकेश जी को सादर समर्पित - 
बहुत बधाई तुमको भैया! 
अब तुम गीत नहीं लिखते हो 
जैसे हो तुम मन के अंदर
वैसे ही बाहर दिखते हो
बहुत बधाई तुमको भैया!
*
अब न रहा कंकर में शंकर, कण-कण में भगवान् कहाँ है? 
कनककशिपु तो पग-पग पर हैं, पर प्रहलाद न कहीं यहाँ है   
शील सती का भंग करें हरि, तो कैसे भगवान हम कहें?
नहीं जलंधर-हरि में अंतर, जन-निंदा में क्यों न वे दहें? 
वर देते हैं शिव असुरों को  
अभय दान फिर करें सुरों को   
आप भवानी-भंग संग रम
प्रेरित करते नारि-नरों को 
महाकाल दें दण्ड भयंकर  
दया न करते किंचित दैया!
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
जन-हित राजकुमार भेजकर, सत्तासीन न करते हैं अब 
कौन अहल्या को उद्धारे?, बना निर्भया हँसते हैं सब   
नाक आसुरी काट न पाते, लिया कमीशन शीश झुकाते  
कमजोरों को मार रहे हैं, उठा गले से अब न लगाते  
हर दफ्तर में, हर कुर्सी पर  
सोता कुम्भकर्ण जब जागे  
थाना हो या हो न्यायालय  
सदा भुखमरा रिश्वत माँगे  
भोग करें, ले आड़ योग की 
पेड़ काटकर छीनें छैंया  
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
जब तक था वह गगनबिहारी, जग ने हँस आरती उतारी 
छलिये को नटनागर कहकर, ठगी गयी निष्ठा बेचारी  
मटकी फोड़ी, माखन खाया, रास रचाई, नाच नचाया 
चला गया रणछोड़ मोड़ मुख, युगों बाद सन्देश पठाया 
कहता प्रेम-पंथ को तज कर 
ज्ञान-मार्ग पर चलना बेहतर 
कौन कहे पोंगा पंडित से 
नहीं महल, हमने चाहा घर 
रहें द्वारका में महारानी 
हमें चाहिए बाबा-मैया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
असत पुज रहा देवालय में, अब न सत्य में है नारायण  
नेह नर्मदा मलिन हो रही, राग-द्वेष का कर पारायण   
लीलावती-कलावतियों को 'लिव इन' रहना अब मन भाया   
कोई बाँह में, कोई चाह में, खुद को ठगती खुद ही माया       
कोकशास्त्र केजी में पढ़ती, 
नव पीढ़ी के मूल्य नये हैं 
खोटे सिक्कों का कब्ज़ा है 
खरे हारकर दूर हुए हैं   
वैतरणी करने चुनाव की 
पार, हुई है साधन गैया 
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
दाँत शेर के कौन गिनेगा?, देश शत्रु से कौन लड़ेगा?   
बोधि वृक्ष ले राजकुँवरि को, भेज त्याग-तप मौन वरेगा?
जौहर करना सर न झुकाना, तृण-तिनकों की रोटी खाना 
जीत शौर्य से राज्य आप ही, गुरु चरणों में विहँस चढ़ाना  
जान जाए पर नीति न छोड़ें  
धर्म-मार्ग से कदम न मोड़ें  
महिषासुरमर्दिनी देश-हित  
अरि-सत्ता कर नष्ट, न छोड़ें   
सात जन्म के सम्बन्धों में 
रोज न बदलें सजनी-सैंया 
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
युद्ध-अपराधी कहा उसे जिसने, सर्वाधिक त्याग किया है 
जननायक ने ही जनता की, पीठ में छुरा भोंक दिया है 
सत्ता हित सिद्धांत बेचते, जन-हित की करते नीलामी  
जिसमें जितनी अधिक खोट है, वह नेता है उतना दामी   
साथ रहे सम्पूर्ण क्रांति में  
जो वे स्वार्थ साध टकराते  
भूले, बंदर रोटी खाता  
बिल्ले लड़ते ही रह जाते  
डुबा रहे मल्लाह धार में  
ले जाकर अपनी ही नैया 
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
कहा गरीबी दूर करेंगे, लेकिन अपनी भरी तिजोरी    
धन विदेश में जमा कर दिया, सब नेता हो गए टपोरी    
पति पत्नी बच्चों को कुर्सी, बैठा देश लूटते सब मिल  
वादों को जुमला कह देते, पद-मद में रहते हैं गाफिल   
बिन साहित्य कहें भाषा को   
नेता-अफसर उद्धारेंगे    
मात-पिता का जीना दूभर 
कर जैसे बेटे तारेंगे  
पर्व त्याग वैलेंटाइन पर  
लुक-छिप चिपकें हाई-हैया   
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*****

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