स्तम्भ menu

Drop Down MenusCSS Drop Down MenuPure CSS Dropdown Menu

रविवार, 26 जून 2016

geet

​​रचना - प्रति रचना 
राकेश खण्डेलवाल-संजीव 'सलिल'
*
रचना-
जिन कर्जों को चुका न पायें उनके रोज तकाजे आते
हमसे मांग रही हैं सांसें अपने जीने की मजदूरी

हमने चाहा था मेघों के
उच्छवासों से जी बहलाना
इन्द्रधनुष बाँहों में भरकर
तुम तक सजल छन्द पहुँचाना
वनफूलोळ की छवियों वाली
मोहक खुश्बू को संवार कर
होठों पर शबनम की सरगम
आंखों में गंधों की छाया

किन्तु तूलिका नहीं दे सकी हमें कोई भी स्वप्न सिन्दूरी
रही मांहती रह रह सांसें अपने जीने की मजदूरी

सीपी रिक्त रही आंसू की 
बून्दें तिरती रहीं अभागन
खिया रहा कठिन प्रश्नों में
कुंठित होकर मन का सर्पण
कुछ अस्तित्व नकारे जिनका 
बोध आज डँसता है हमको
गज़लों में गहरा हो जाता
अनायास स्वर किसी विरह का

जितनी चाही थी समीपता उतनी और बढ़ी है दूरी
हमसे मांग रही हैं सांसें अपने जीने की मजदूरी

नहीं सफ़ल जो हुये उन्हीं की
सूची में लिखलो हम को भी
पर की कब स्वीकार पराजय ?
क्या कुछ हो जाता मन को भी
बुझे बुझे संकल्प सँजोये
कटी फ़टी निष्ठायें लेकर
जितना बढ़े, उगे उतने की
संशय के बदरंग कुहासे


किसी प्रतीक्षा को दुलराते, भोग रहे ज़िन्दगी अधूरी
और मांगती रहती सांसें अपने जीने की मजदूरी.

***
प्रतिरचना- 
हम कर्ज़ों को लेकर जीते, खाते-पीते क़र्ज़ जरूरी
रँग लाएगी फाकामस्ती, सोच रहे हैं हम मगरूरी 
जिन कर्जों को चुका न पायें, उनके रोज तकाजे आते
हमसे माँग रही हैं साँसें, अपने जीने की मजदूरी

मेघदूत से जी बहलाता, 
           अलकापुरी न यक्ष जा सका 
इंद्रधनुष के रंग उड़ गए, 
           वन-गिरि बिन कब मेघ आ सका?  
ऐ सी में उच्छ्वासों से जी, 
           बहलाते हम खुद को छलते  
सजल छन्द को सुननेवाले, 
           मानव-मानस खोज न मिलते 

मदिर साथ की मोहक खुशबू, सपनों की सरगम सन्तूरी 
आँखों में गंधों की छाया, बिसरे श्रृद्धा-भाव-सबूरी 
अर्पण आत्म-समर्पण बन जब, तर्पण का व्यापार बन गया 
हमसे माँग रही हैं साँसें, अपने जीने की मजदूरी

घड़ियाली आँसू गंगा बन, 
           नेह-नर्मदा मलिन कर रहे 
साबरमती किनारेवाले, 
           काशी-सत्तापीठ वर रहे
क्षिप्रा-कुंभ नहाने जाते, 
           नीर नर्मदा का ही पाते  
ग़ज़ल लिख रहे हैं मनमानी 
           व्यर्थ 'गीतिका' उसे बताते 

तोड़-मरोड़ें छन्द-भंग कर, भले न दे पिंगल मंजूरी 
आभासी दुनिया के रिश्ते, जिए पिए हों ज्यों अंगूरी 
तजे वर्ण-मात्रा पिंगल जब, अनबूझी कविताएँ रचकर 
हमसे माँग रही हैं साँसें, अपने जीने की मजदूरी

मानपत्र खुद ही लिख लाये  
           माला श्रीफल शाल ख़रीदे 
मंच-भोज की करी व्यवस्था  
           लोग पढ़ रहे ढेर कसीदे 
कालिदास कहते जो उनको  
           अकल-अजीर्ण हुआ है गर तो 
फर्क न कुछ, हम सेल्फी लेते 
           फाड़-फाड़कर अपने दीदे 

वस्त्र पहन लेते लाखों का, कहते सच्ची यही फकीरी
पंजा-झाड़ू छोड़ स्वच्छ्ता, चुनते तिनके सिर्फ शरीरी 
जनसेवक-जनप्रतिनिधि जनगण, को बंधुआ मजदूर बनाये    
हमसे माँग रही हैं साँसें, अपने जीने की मजदूरी
*****

कोई टिप्पणी नहीं: