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रविवार, 5 जून 2016

muktika

मुक्तिका
*
मन शिरीष खिलता रहे
व्यथा किसी से क्यों कहे?
*
सुन हँस सके न जड़ जगत
सूरज सम हर दिन दहे
*
नेह-नर्मदा नित नहा
अपनापन पल-पल तहे
*
अवमूल्यन की बाढ़ को
मुस्काता अविचल सहे
*
नए स्वप्न निज नयन में
नवपीढ़ी खातिर गहे
*
[भागवत जातीय, चण्डिका छंद]
५-६-२०१५

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