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मंगलवार, 28 जून 2016

smruti geet

स्मृति गीत
*
अपलक तुम्हें निहारूँ कैसे ?
*
नयन खुले तो लुक-छिप जाते
नयन मुँदे तो झलक दिखाते
ओ मेरे तुम! कहाँ खो गये?
रोक न पाये हम पछताते
जब तक सिर पर छाँव रही तव
तब तक हमने धूप न जानी
तुम बिन नाते हुए पराये
तुम बिन यह दुनिया बेगानी
बोलो तुम्हीं गुहारूँ कैसे
अपलक तुम्हें निहारूँ कैसे ?
*
सुधियों से मन भर आता है
तुम्हें याद कर तर जाता है
तुम नर्मदा-अमरकंटक से-
जननि-जनक पावन नाता है
बूँद मात्र हम, सलिल-धार तुम
जान सके अब, थे अपार तुम
शिला सदृश जग निर्मम-निष्ठुर
करो कृपा, सुन लो गुहार तुम
तनिक कहो अवतारूँ कैसे?
अपलक तुम्हें निहारूँ कैसे ?
*
कैंया मिली, मचलना सीखा
अँगुली थामी, चलना सीखा
गिर-रोये, आ तुरत उठाया
गिर-उठ,चलना-बढ़ना सीखा
तुमसे साँसें-सपने पाये
रिश्ते-नाते अपने पाये
हमसे कब-क्या खता हो गयी?
गये दूर, अब तलक न आये
श्वास-श्वास में बसे हुए हो
पल भर कहो बिसारूँ कैसे?
***
(संस्कारी जातीय, मुक्तक छन्द)

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