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शनिवार, 23 जुलाई 2016

राष्ट्रीय शिक्षा नीति सुझाव

​प्रतिष्ठा
 में 
माननीय श्री प्रकाश जावड़ेकर जी
मानव संसाधन विकास मंत्री
भारत सरकार

​विषय- राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर सुझाव। 

मान्यवर 
           वंदे मातरम। 
० १. प्रकृति गर्भ से ही जीव को शिक्षित करना प्रारम्भ कर देती है। माता प्रथम गुरु होती है अत:,   माँ द्वारा उपयोग की जाती भाषा जातक की मातृभाषा होती जिसके शब्दों और उनके साथ जुडी संवेदना को शिशु गर्भ से ही पहचानने लगता है। विश्व के सभी शिक्षा-शास्त्री और मनोवैज्ञानिक एकमत हैं कि शिशु का शिक्षण मातृ भाषा में होना चाहिए। दुर्योगवश भारत में राजनैतिक स्वतंत्रता मिलने के तुरंत बाद अंग्रेजभक्त नेता, दल और प्रशासनिक अधिकारी सत्ता पर आ गए और मातृभाषा तथा राजभाषा उपेक्षित होकर पूर्व संप्रभुओं की आंग्ल भाषा शिक्षा पर थोप दी गयी। वर्तमान में सबसे पहली प्राथमिकता शिक्षा के माध्यम के रूप में पहला स्थान मातृभाषा फिर राज भाषा हिंदी को देना ही हो सकता है। अंग्रेजी का भाषिक आतंक यदि अब भी बना रहा तो वह भविष्य के लिए घातक और त्रासद होगा।

 ०२. शिक्षा की दो प्रणालियाँ शैशव से ही समाज को विभक्त कर देती हैं। अत:, निजी शिक्षण व्यवस्था को हतोत्साहित कर क्रमश; समाप्त किया जाए। राष्ट्रीय एकात्मकता के लिये भाषा, धर्म, क्षेत्र, लिंग या अभिभावक की आर्थिक स्थिति कुछ भी हो हर शिशु को एक समान शिक्षा प्राथमिक स्तर पर दी जाना अपरिहार्य है। इस स्तर पर मातृ भाषा, राजभाषा, गणित, सामान्य विज्ञान (प्रकृति, पर्यावरण, भौतिकी, रसायन आदि), सामान्य समाज शास्त्र (संविधान प्रदत्त अधिकारों व् कर्तव्यों की जानकारी, भारत की सभ्यता, संस्कृति, सर्व धर्म समभाव, राष्ट्रीयता, मानवता, वैश्विकता आदि), मनोरंजन (साहित्य, संगीत, नृत्य, खेल, योग, व्यायाम आदि), सामाजिक सहभागिता व समानता (परिवार, विद्यालय, ग्राम, नगर, राष्ट्र, विश्व के प्रति कर्तव्य) को केंद्र में रखकर दी जाए। बच्चे में शैशव से ही उत्तरदायित्व व् लैंगिक समानता का भाव विकसित हो तो बड़े होने पर उसका आचरण अनुशासित होगा और अनेक समस्याएँ जन्म ही न लेंगीं। 

०३. माध्यमिक शिक्षा का केंद्र बच्चे के प्रतिभा, रूचि, योग्यता, आवश्यकता और संसाधनों का आकलन कर उसे शिक्षा ग्रहण करने के क्षेत्र विशेष का चयन करने के लिए किया जाना चाहिए। प्राथमिक शिक्षा के विषयों में कुछ अधिक ज्ञान देने के साथ-साथ शारीरिक-मानसिक सबलता बढ़े तथा अभीष्ट दिशा का निर्धारण इसी स्तर पर हो तो कैशोर्य समाप्त होने तक बच्चे में उत्तरदायित्व के प्रति जागरूकता व् उत्सुकता होगी, साथ ही सामने एक लक्ष्य भी होगा। जिस बच्चे में किसी खेल विशेष की प्रतिभा हो उसे उस खेल विशेष का नियमित तथा विशिष्ट प्रशिक्षण उपलब्ध करा सकनेवाली संस्था में प्रवेश दे कर अन्य विषय पढ़ाए जाए। इसी तरह संगीत, कला, साहित्य, समाजसेवा, विज्ञान आदि की प्रतिभा पहचान कर स्वभाषा में शिक्षण दिया जाए। हर विद्यालय में स्काउट / गाइड हो ताकि बच्चों में चारित्रिक गुणों का विकास हो।  

०४. उच्चतर माध्यमिक स्तर पर हर बच्चे की प्रतिभा के अनुरूप क्षेत्र में उसे विशेष शिक्षण मिले। इस स्तर पर यह भी पहचान जाए कि किस विद्यार्थी में उच्च शिक्षा ग्रहण करने की पात्रता और चाहत है तथा कौन आजीविका अर्जन को प्राथमिकता देता है? जिन विद्यार्थियों में व्यावहारिक समझ अधिक और किताबी ज्ञान में रूचि कम हो उन्हें रोजगारपरक शिक्षा हेतु पॉलिटेक्निक और आई. आई. टी. में भेजा जाए जबकि किताबी ज्ञान में अधिक रूचि रखनेवाले विद्यार्थी स्नातक शिक्षा हेतु आगे जाएँ। हर विद्यार्थी में चारित्रिक विकास के लिए स्काउट / गाइड अनिवार्य हो।  

०५. विद्यार्थी स्नातक पाठ्यक्रम हेतु खुद विषय न चुने अपितु मनोवैज्ञानिक परीक्षण कर उसकी सामर्थ्य और उसमें छिपी सम्भावना का पूर्वानुमान कर उसे दिशा-दर्शन देकर उसके लिये सर्वाधिक उपयुक्त विषय, उस विषय के योग्यतम शिक्षक जिस संस्थान में हों वहाँ उसे प्रवेश दिया जाए। हर विद्यार्थी को एन. सी. सी. लेना अनिवार्य हो ताकि उसमें आत्मरक्षण, अनुशासन तथा चारित्रिक गुण विकसित हों।  आपदा अथवा संकट काल में वह अपनी और अन्यों की रक्षा करने के प्रति सजग हो।  

०६. शालेय शिक्षा की अंतिम परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर ही स्नातक कक्षाओं में प्रवेश हो। सभी चयन परीक्षाएँ तत्काल बंद कर दी जाएँ तो इन के आयोजन में व्यर्थ खर्च होनेवाली विशाल धनराशि, स्टेशनरी, कार्य घंटे, इनके आयोजन में हो रहा भ्रष्टाचार (उदाहरण व्यापम, बिहार का फर्जीवाड़ा आदि) अपने आप समाप्त हो जायेगा तथा अभिभावक को पैसों की दम पर अयोग्य को बढ़ाने का अवसर न मिलेगा। इससे शालेय स्तर पर गंभीरता से पढ़ने और अनुशासित रहने की प्रवृत्ति भी होगी।

०७. स्नातक स्तर पर विषय का अद्यतन ज्ञान देने के साथ-साथ विद्यार्थी की शोध क्षमता का आकलन हो। जिनकी रुचि व्यवसाय में हों वे इसी स्तर पर संबंधित विषय के प्रबंधन, कानूनों, बाज़ार, अवसरों और सामग्रियों आदि पर केंद्रित डिप्लोमा कर व्यवसाय में आ सकेंगे। इससे उच्च शिक्षा स्तर पर अयोग्य विद्यार्थियों की भीड़ कम होगी और योग्य विद्यार्थियों पर अधिक ध्यान दिया जा सकेगा।

०८. स्नातकोत्तर कक्षाओं में वही विद्यार्थी प्रवेश पायें जिन्हें शिक्षण अथवा शोध कार्य में रूचि हो। प्राथमिक, माध्यमिक, उच्चतर माध्यमिक, स्तर तक अध्यापन हेतु स्नातक शिक्षा तथा अध्यापन शास्त्र में विशेष शिक्षा आवश्यक हो। स्नातकोत्तर कक्षाओं में अध्यापन हेतु शोध उपाधि अपरिहार्य हो। 

०९ शोध निदेशक बनने हेतु शोध उपाधि के साथ पाँच वर्षीय अध्यापन अनुभव अनिवार्य हो जिसमें ७५% विद्यार्थी उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण हुए हों।  

१०. तकनीकी (अभियांत्रिकी / चिकित्सा / कृषि ) शिक्षा- इन क्षेत्रों में उच्चतर माध्यमिक परीक्षा में प्राप्तांकों के आधार पर विद्यार्थी को प्रवेश दिया जाय। प्रतियोगिता परीक्षाएँ समाप्त की जाएँ ताकि विशाल धनराशि, लेखा सामग्री एवं ऊर्जा का अपव्यय और भ्रष्टाचार समाप्त हो। विद्यार्थियों को उपलब्ध स्थान के अनुसार  मनपसन्द शाखा तथा स्थान समाप्त होने पर उपलब्ध शाखा में प्रवेश लेना होगा। निजी अभियांत्रिकी महाविद्यालयों को शासन ने रियायती दर पर बहुमूल्य भूमि और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराई हैं। इनके प्रबंधक प्राध्यापकों को न्यूनतम से काम पारिश्रमिक देकर उनका शोषण कर रहे हैं।  कम वेतन के कारण विषय के विद्वान् शिक्षक यहाँ नहीं हैं। औसत अंक लेकर उत्तीर्ण हुआ विषय का पूरा ज्ञान नहीं रखता तो वह विद्यार्थी को पूरा विषय कैसे पढ़ा सकता है? फलत: सा; दर साल अभियांत्रिकी उपाधिधारकों का स्तर निचे गिर रहा है। माननीय प्रधानमंत्री जी इस सन्दर्भ में कई बार चिंता व्यक्त कर चुके हैं। जिन निजी शैक्षणिक संस्थाओं के विद्यालय / महाविद्यालय घाटे में बताये जा रहे हैं उनसे शासन मूल कीमत देकर भूमि तथा वर्तमान मूल्यांकन के आधार पर भवन वापिस लेकर वहाँ अभियांत्रिकी या अन्य विषयों के शिक्षण संस्थान चलाए या भवनों का कार्यालय आदि के लिए उपयोग कर ले।   

१ १. तकनीकी शिक्षा का स्तर उठाने के लिये सभी परीक्षाएँ ऑन लाइन हों। प्रश्नों की संख्या अधिक रखी जाए ताकि नकल करना या प्रश्नोत्तरी किताबों से पढ़ने की प्रवृत्ति घटे और विषय की मुख्य पाठ्यपुस्तक से पूरी तरह पढ़े बिना उत्तीर्ण होना संभव न रहे। किसी विषय में शिक्षा प्राप्त युवा उसी क्षेत्र में सेवा या व्यापार कार्य करें। किसी पद के लिए निर्धारित से काम या अधिक योग्यता के उम्मीदवार विचारणीय न हों क्यों कि ऐसा न होने पर सामान योग्यताधारकों को समान अवसर के नैसर्गिक सिद्धांत का पालन नहीं हो पाता।  

१२. प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारी तकनीकी क्षेत्र के कार्यों का प्रबंधन, मार्गदर्शन और नियंत्रण करते हैं इसलिए इन पदों के लिए तकनीकी शिक्षाधारी ही सुपात्र हैं। तकनीकी शिक्षा के पाठ्यक्रम में सम्बंधित विषय से जुड़े अथवा कार्यक्षेत्र में प्रयुक्त होनेवाले कानूनों, प्रबंधन शास्त्र, लेखा शास्त्र तथा प्रशासन कला से जुड़े प्रश्न पत्र जोड़े जाएँ ताकि तकनीकी स्नातक कार्य क्षेत्र में इनसे जुडी जिम्मेदारियों को सुचारू रूप से वहन कर सकें। तकनीकी उपाधि के समान्तर प्रबंधन और प्रशासन की उपाधि का अध्ययन कराया जा सकें तो ५ वर्ष की समयावधि में दो उपाधिधार युवक को अवसर प्राप्ति अधिक होगी।  

१३. शासकीय कार्य विभागों में ठेकेदारी हेतु अभियांत्रिकी में स्नातक होना अनिवार्य हो ताकि गैर तकनीकी ठरकेदारों से कार्य की गुणवत्ता न गिरे।

१४. अभियांत्रिकी पाठ्यक्रमों में मानक संहिताओं को सम्मिलित किया जाए। नेशनल बिल्डिंग कोड आदि विद्यार्थियों को रियायती मूल्य पर अनिवार्यत: दिए जाएँ।

१५. अभियंताओं की सर्वोच्च संस्थाओं इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स, इन्डियन जियोटेक्निकल सोसायटी, इंडियन अर्थक्वैक सोसायटी आदि की मदद से पाठ्यक्रमों का पुनर्निर्धारण हो।  पूरे देश में एक समान पाठ्यक्रम हो। 

१६. इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स के केंद्रों में सदस्य अनुभवी अभियंता होते हैं उनके कौशल और ज्ञान का उपयोग शासकीय योजनाओं के प्रस्ताव बनाने, कार्यों के पर्यवेक्षण, मूल्यांकन, संधारण आदि में किया जा सकता है। सेवानिवृत्त अभियंताओं की योग्यता का लाभ देश और समाज के लिये लिया जा सकता है। 

१७. प्राकृतिक आपदाओं तथा संकट काल का सामना करने  विशेष प्रविधियों की आवश्यकता होती है।  ऐसे समय में हर नागरिक की भूमिका महत्वपूर्ण तथा अन्यों की जीवन बचने में महत्वपूर्ण होती है। सभी पाठ्यक्रमों में आपदा प्रबंधन  तथा सामान्य स्वास्थ्य रक्षा सम्बन्धी सामग्री जोड़ी जाए। 

१८. सभी पाठ्यक्रमों में शिक्ष का माध्यम हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाएँ हों। अंग्रेजी की भूमिका क्रमश: समाप्त की जाए। 

मुझे आशा ही  विश्वास है की सुझवों पर विचार कर समुचित निर्णय लिए जायेंगे। इस सम्बन्ध में किसी भी प्रकार का सहयोग कर प्रसन्नता होगी।    

२२-७-२०१६                                                                                                एक नागरिक 
salil.sanjiv@gmail.com                                                        अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल'
चलभाष ९४२५१८३२४४                                                                    अधिवक्ता उच्च न्यायालय मध्य प्रदेश 
समन्वयम २०४ विजय अपार्टमेंट, 
नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१

1 टिप्पणी:

Mahavir Uttranchali ने कहा…

"महावीर" यह राष्ट्र, एक स्वर में गाएगा
शिक्षा पर यदि केंद्र, कठोर नीति लाएगा
अमीर-ग़रीब भेद, फिर कहाँ रह पायेगा
यदि शिक्षा का ग्राफ़, एक सा हो जायेगा
भारत को यह विश्व भी, बड़े गर्व से देखता
शिक्षा एक समान यदि, और बढ़ेगी एकता
— कवि: महावीर उत्तरांचली